Thursday, September 8, 2011

ठाठ-बाठ से निकली भगवान चारभुजानाथ की शोभायात्रा

राजसमंद, । धर्मनगरी चारभुजा में जलझुलनी एकादशी पर गुरुवार को मेवाड़ के प्रसिद्ध धार्मिक लक्खी मेले में श्रद्धा का ज्वार उमड़ पड़ा। धर्मनगरी छोगाला छेल के जयकारों से गूंजती रही। इस अवसर पर भगवान चारभुजानाथ की पूरे ठाठ-बाठ से शोभायात्रा निकाली गई तथा भगवान को परम्परागत तरीके से दूधतलाई में पवित्र स्नान कराया गया।
भगवान के दर्शनार्थ लोगों का सैलाब सुबह चार बजे से ही मंदिर परिसर में उमडऩा शुरू हो गया। सुबह पांच बजे भगवान चारभुजा के मंगला आरती के दर्शन खुले जो एक घंटे तक रहे। इसके बाद साढ़े आठ बजे से ग्यारह बजे तक भी दर्शन खुले रहे इसके साथ ही मंदिर परिसर में पूजारीगण शोभायात्रा के लिए भगवान को श्रृंगारित करने में जुटे रहे। परम्परानुसार भगवान चतुर्भुज की बाल स्वरूप प्रतिमा को वस्त्र एवं आभुषणों का श्रृंगार धराने के बाद स्वर्ण पालकी में बिराजित किया गया। इस दौरान मंदिर चौक में हजारों की तादाद में भक्तजन जमा हो गए जो चारभुजानाथ के गगनभेदी जयकारों के साथ नाच गाकर असीम हर्ष को प्रदर्शित कर रहे थे। सभी गुलाल से सरोबार होकर भक्तिभाव में लीन दिखाई दिए। सभी की निगाहें मंदिर द्वार पर टिकी थी कारण उन्हें भगवान की पालकी के आने का इंतजार था। पालकी के आने का ज्यों ज्यों समय नजदीक आता गया। श्रद्धालुओं की उत्सुकता द्विगुणित होती गई। ठीक पौने बारह बजे मंदिर से पूजारीगण बाहर आए तो उन्हें पालकी के आने का आभास हो गया। दर्शनों की उत्सुकता से वशीभुत भक्तजनों ने ‘छोगाला छेल की जै,’ ‘हाथी घोड़ा पालकी, जै कन्हैयालाल की’ आदि के जयकारे लगाए। जयकारों के समवेत स्वर से समूचा परिवेश गुंजायमान हो उठा। कुछ ही पल बाद भगवान की स्वर्ण पालकी मंदिर की सीढिय़ों से होते हुए चौक की ओर बढ़ती दिखी तो वहां मौजूद हरेक भक्तजन भगवान चतरर्भुज के स्वरूप को एक पल निहारने के लिए आतुर हो उठा किसी ने निकट से निहार कर स्वयं को धन्य माना तो किसी ने भीड़ की वजह से दूर से नतमस्तक किया। इस बीच शोभायात्रा की रवानगी हो गई। शोभायात्रा में सबसे आगे निवाण एवं ऊंट पर नंगारखाना, गजराज, अश्व एवं प्रभु के लिए रजत पालकी शामिल थी तो पीछे बैण्डबाजे भक्तिगीतों की स्वर लहरियां बिखरते चल रहे थे। उनके पीछे पारम्परिक वेशभुषा में सैंकड़ो पूजारीगण चल रहे थे जो अपने गले में सोने की कंठी व डोरा तथा पगड़ी एवं पछेवड़ी व चन्द्रमा धारण किए हुए थे। पूजारीगण हाथों में चांदी की छंडिया, गोटे, तलवारे, भाले आदि लिए पालकी के आगे भगवान की सेवामें खम्माघणी करते हुए चल रहे थे। मार्ग में छतरी पर भगवान को अमल का भोग धराया गया। शोभायात्रा के दूधतलाई पहुंचने पर पूजारीगण भगवान को पवित्र स्नान कराने दौड़ पड़े। भक्तजनों में भी होड लगी हुई थी कि वे भी भगवान को पानी के छींटे लगाकर स्नान कराएं। स्नान कराने के बाद पूजारीगण बाल स्वरूप प्रतिमा को छतरी में लाए तथा प्रभु के भीगे वस्त्रों को उतारा। पूजारी गोर्वधन राजावत ने प्रतिमा को केवड़े के फुल में लपेट कर अपने सिर पर धारण कर दूधतलाई की परिक्रमा शुरू की। परिक्रमा के दौरान दूधतलाई के पानी में खड़े श्रद्धालुओं ने प्रतिमा व पूजारीगण पर पानी उड़ेल कर आनन्द लिया। परिक्रमा मार्ग में स्थित छतरी में परम्परानुसार झीलवाड़ा ठिकाने की ओर से दौलतसिंह सौलंकी ने भगवान को अमल अरोगाई।
परिक्रमा पूर्ण होने पर पूजारीगण ने प्रभु को नए वस्त्र और आभूषणों से श्रृंगारित कर पूजारियों ने हरजस गाया। रजत पालकी में बिराजित किया तथा मंदिर के लिए रवानगी की। पूजारीगण भजन कीर्तन करते वापस मंदिर पहुंचे तथा आरती के साथ भगवान की बाल प्रतिमा को पुन: गर्भ गृह में बिराजित किया।
किरण ने किए चारभुजानाथ के दर्शन : चारभुजा में गुरुवार को आयोजित जलझुलनी एकादशी मेले में राजसमन्द विधायक किरण माहेश्वरी व अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी भागीदारी की तथा भगवान चारभुजानाथ के दर्शन किए। किरण के साथ पूर्व प्रधान कुम्भलगढ़ कमला जोशी, पूर्व उप प्रधान निर्भय सिंह झाला, पूर्व जिला परिषद सदस्य ललित चोरडिय़ा आदि ने भी भगवान के दर्शन किए।
जयकारों से गुंजती रही धर्मनगरी, दिनभर रही रैलमपेल : जलझुलनी एकादशी के अवसर पर धर्मनगरी में दिनभर रैलमपेल रही एवं समूचा परिवेश भगवान चारभुजानाथ के जयकारों से गुंजायमान रहा। सुबह से ही धर्मनगरी में श्रद्धालुओं की अपार आवक शुरू हो गई थी जो दोपहर तक जारी रही। बस स्टेण्ड से मंदिर तक एवं मंदिर के आसपास के क्षेत्र में दिनभर भारी रेलमपेल लगी रही। ग्यारह बजे बाद से एक घण्टे तक तो बस स्टेण्ड से मंदिर तक रास्ते में तिलभर भी जगह खाली नहीं थी। शोभायात्रा के दौरान दूधतलाई जाने के लिए मुख्य मार्ग के अलावा यहां कि संकड़ी गलियों एवं इससे आगे दो अन्य वैकल्पिक मार्गो पर भी लोगों की आवाजाही लगी रही।
गुलाल से श्रद्धालु सरोबार, रास्ते भी रंग गए : जलझुलनी एकादशी के मेले के अवसर पर धर्मनगरी में खुब गुलाल उड़ी, इस दौरान सभी श्रद्धालु सरोबार थे तो रास्ते रंग गए। शोभायात्रा से पूर्व एक घंटे तक मंदिर चौक में प्रभु की पालकी के इंतजार में आतुर श्रद्धालुओं ने इतनी गुलाल उड़ेली की सभी श्रद्धालु तो इससे सरोबार हुए ही पूरा चौक भी रंगीन हो गया। यही नहीं शोभायात्रा के मार्ग एवं अन्य गली मौहल्लों में भी रास्ते गुलाल से सरोबार हो गए।
प्रशासन, पुलिस ने की चौकसी : धर्मनगरी चारभुजा में जलझुलनी एकादशी मेले में कानूनी एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन एवं पुलिस चौकस रही। मंदिर के पास नियंत्रण स्थापित किया गया जहां से व्यवस्था का संचालन किया गया।


व्यक्ति का तर्कवाद होना आवश्यकः आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि आज के परिवेश में व्यक्ति का तर्कवादी होना अत्यंत आवश्यक है। आध्यात्म के क्षेत्र में तार्किकता का भाव होना चाहिए। मैं स्वयं तर्कवाद को काम में लेता हंू। तर्कवाद मनुष्य को ज्ञानी और विषयविद् बनाने में मदद करता है। आचार्यश्री ने उक्त उद्गार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान अमृत महोत्सव के दूसरे दिन गुरुवार को आयोजित कार्यक्रम में मौजूद हजारों लोगांे को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्द्धात्मक इस युग में आदमी के दिमाग में तर्क पैदा होना चाहिए। तार्किक व्यक्ति बात को अच्छी तरह से समझता है और परस्पर बातचीत में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि सामने वाला तर्क की बातों का कोई जवाब नहीं दे पाता और निरुत्तर हो जाता है। जो व्यक्ति तर्क करना नहीं जानता वह मूक प्राणी है। आज जिस व्यक्ति के पास भाषा है, लेकिन उस पर नियंत्रण नहीं है तो भाषा का ज्ञान होना अनावश्यक हो सकता है। जिसके पास शब्द भंडार है वह ब्रहृा है। जिसके पास साहित्यक शक्ति नहीं है वह पंगु है और जिसके पास तर्क नहीं है। वह अपनी बात कहने में असमर्थ होता है। आचार्यश्री ने कहा कि अध्यात्म के क्षेत्र में श्रद्धा का बडा महत्व है। दो प्रकार के पदार्थ है हेतु गम्य और अहेतु गम्य। आचार्यश्री भिक्षु की भूमि पर बैठे है। वे बेजोड थे और उनमें श्रद्धा भरी हुई थी। तेरापंथ में तर्क और श्रद्धा दोनों का प्रयोग होता है। धर्म संघ में सर्वोच्च आचार्य होते है। मेरा 50 वां वर्ष चल रहा है। जन्म दिन को मनाना आवश्यक नहीं मानता। जन्म लेना बडी बात नहीं है। कृतत्व का शताब्दी समारोह मनाया जाए तो अच्छी बात होती है। मेरा अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। मैं संघ की बात को ना नहीं कह सकता। उन्होंने कहा कि 12 व्रतों को धारण करने की लहर चल रही है। नशामुक्ति का कार्य भी चल रहा है। संस्कृत भाषा का अभ्यास मंद न पडे। इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता है। इसका अभ्यास निरन्तर चलता रहना चाहिए। मैं अनुभव करता हंू कि तेरापंथ के आचार्य के पास कितनी शक्ति है। यह बडा वैभव है। इस वैभव का उपयोग धर्मसंघ के विकास में होता रहे और समाज विकास के पथ पर अग्रसर हो। केन्द्रीय संस्थाएं निरन्तर काम कर रही है। यह फूलों से भी बडी संस्था संस्था है। यह नीति निर्धारण का मंच है। महासभा भी कार्य कर रही है। तेरापंथ युवक परिषद् में युवाओं की फौज है। एक अच्छा नेटवर्क बना हुआ है। यह युवा हमारी शक्ति है। इस अवसर पर साघ्वी सुमतिप्रभा, साध्वी शशिप्रभा, साध्वी सदुप्रभा, साध्वी स्वस्तिकप्रभा, मुनि पुलकित कुमार, शासन गौरव मुनि धनंजय कुमार, मुनि अशोककुमार, साध्वी सुभ्रयशा और मुनि महावीर ने गीत का संगान और अपने विचार प्रकट किए। प्रारंभ में मुमुक्षु परिवार की ओर से मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया और अमृत महोत्सव के दूसरे दिन का आगाज हुआ। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में तेरापंथ विकास परिषद् की ओर से कन्हैयालाल छाजेड, जय तुलसी फाउन्डेशन की ओर से हीरालाल मालू, जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चैनरूप चंडालिया, जैन विश्व भारती के विजयसिंह चौरडिया, जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय की कुलपति समकी चरित्रप्रज्ञा, अणुव्रत महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूलाल गोलछा, राष्ट्रीय अणुव्रत शिक्षक संसद के धर्मचंद जैन अनजाना, पारमार्थिक शिक्षक संस्था के बजरंग जैन, प्रेक्षा विश्व भारती अहमदाबाद के जसराज वुरड, तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के सलील लोढा, अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् के अध्यक्ष गौतम डागा और अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कनक परमेचा ने विचार व्यक्त किए।
आचार्य तुलसी कर्तव्य पुरस्कार उदयपुर की नीलिमा खेतान को
इस अवसर पर अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कनक परमेचा ने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा करते हुए बताया कि इस वर्ष का आचार्य तुलसी व्यक्तित्व पुरस्कार सेवा सदन संस्था उदयपुर की नीलिमा खेतान को उनके द्वारा आदिवासी क्षेत्रों के विकास में किए गए कार्यों को लेकर दिया जाएगा। इसके साथ ही श्राविका गौरव पुरस्कार मुंबई की प्रेम सिसोदिया और सुशीला कच्छारा को दिया जाएगा। प्रतिभा पुरस्कार मीनाक्षी बुतोडिया को प्रदान किया जाएगा। तेरापंथ युवक परिषद् की ओर से इस वर्ष प्रदान किए जाने वाले पुरस्कारों की भी घोषणा कार्यक्रम के दौरान की गई। आचार्य महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार प्रमोद घोडावत व आचार्य महाश्रमण पुरस्कार जयपुर के सुधीर चौरडिया को दिया जाएगा।
रक्तदान शिविर आज
अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् व तेरापंथ किशोर मंडल के तत्वावधान में आचार्य महाश्रमण अमृत महोत्सव के द्वितीय चरण में शुक्रवार को केलवा में रक्त दान शिविर आयोजित किया जाएगा। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् के सदस्य और शिविर संयोजक डॉ. विमल कावडिया ने बताया कि सुबह नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक आचार्यश्री महाश्रमण के प्रवचन पांडाल के पास स्थित का्रॅन्फेन्स हॉल में शिविर आयोजित होगा। केलवा तेयुप के अध्यक्ष विकास कोठारी ने बताया कि इस शिविर में 18 से 55 वर्ष की आयु और 40 किलोग्राम से अधिक वजन वाले स्त्री-पुरूष रक्तदान कर सकेगा। तेयुप मंत्री लक्की कोठारी ने बताया कि तेरापंथ युवक परिषद् के विशेष सहयोग से आयोजित होने वाले इस शिविर में भीलवाडा, गंगापुर, ब्यावर, भीम, देवगढ, राजसमंद, केलवा, उदयपुर, सरदारगढ, दिवेर, नाथद्वारा, आमेट, रेलमगरा, शिशोदा, चित्तौडगढ और आसींद आदि युवक परिषद् की सहभागिता रहेगी।


Wednesday, September 7, 2011

केलवा में गणपति विसर्जन

भिक्षु भूमि पर अध्यात्म का नया अध्याय अंकित


देशभर में क्रांतिभूमि का पर्याय बन चुकी केलवा की तपोभूमि पर बुधवार को आध्यात्म का एक ओर नया अध्याय जुड गया। मौका भी ऐसा ही कुछ खास था दो मुमुक्षुओं की दीक्षा समारोह का। अभूतपूर्व जनमैदिनी की साक्षी में तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने दोनों को दीक्षा प्रदान करते हुए संयम के मार्ग पर चलने की अनुमति दी और इस तरह सांसारिक जीवन को त्याग कर अध्यात्म के मार्ग पर चले मुमुक्षु अश्विनी का नामकरण करते हुए मुनि अतुलकुमार और मुमुक्षु चेतना का नाम साध्वी चैतन्ययशा दिया।
कस्बे के तेरापंथ समवसरण में सुबह नौ बजे शुरू हुए दीक्षा समारोह में आचार्यश्री ने दो जैन दीक्षा प्रदान की। उन्होंने पंजाब के मुमुक्षु अश्विनी एवं उदयपुर जिले के सायरा निवासी मुमुक्षु चेतना को दीक्षा प्रदान करते हुए कहा कि तेरापंथ की दीक्षा में बहुत पारदर्शिता होती है। अनेक बार स्वर उठता है कि प्रलोभन, जबरदस्ती सन्यासी बना दिया जाता है। इस तरह के प्रयोग तेरापंथ में मान्य नहीं हैं। प्रलोभन देकर दीक्षा देना मुझे पसंद नहीं है। तेरापंथ में प्रारंभ से ही इस पर ध्यान दिया गया है। इसमें लिखित और मौखिक आज्ञा अभिभावकों से ली जाती है। दीक्षार्थी की परीक्षा होती है। उसके बाद योग्य होने पर दीक्षा दी जाती है। उन्होंने हजारों की जनमैदिनी की उपस्थिति में स्पष्ट शब्दों में कहा कि तेरापंथ में दीक्षा होना सरल बात नहीं है। जो भाग्यशाली होता है वही इस संघ में दीक्षा ले सकता है। यहां दीक्षा लेने के बाद गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण करना होता है। अपनी इच्छा गुरु के सम्मुख निवेदित कर सकता है। पर जो गुरु का निर्णय होगा उसे स्वीकार करना जरुरी होता है। आचार्यश्री ने कहा कि बुद्धिमान लोग तर्क में जीते है। यानि इंन्द्रियों और मन के क्षेत्र में जीते है। आत्मा इंद्रियां तीन क्षेत्र उनसे दूर है। दीक्षा तर्कातीत, इंद्रियांतीत में प्रवेश का द्वार है। दीक्षा लेना बडे भाग्य की बात है। आज दो जन दीक्षित होने जा रहे है। तेरापंथ में बहुत पारदर्शिता है। यहां पर प्रलोभन देकर, जबरदस्ती कर दीक्षा नहीं दी जाती। प्रलोभन देकर दी जाने वाली दीक्षाओं को मैं उचित नहीं मानता। पारदर्शिता का प्रमाण यह है कि लिखित आज्ञा पत्र। लिखित के साथ सबसे मौखिक आज्ञा भी ली जाती है। आचार्यश्री ने नव दीक्षितों को संबोधन देते हुए कहा कि संयम के प्रति जागरूकता एवं निर्देश संयम से हर क्रिया करनी है। जागरूकता रखनी है। क्षमा, कल्याण, विनम्रता का भाव विकास से मंगलकामना।
केंशलोच संस्कार
आचार्यश्री ने दीक्षार्थी अश्विनी का केंशलोच संस्कार संपन्न करते हुए कहा कि शिष्य की चोटी गुरु के हाथों में आ गई है। अब इस लोच का तात्पर्य है गुरु के अनुशासन में रहना। साध्वी दीक्षा लेने वाली मुमुक्षु चेतना का केंशलोच संस्कार साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने किया और प्रतीक तौर पर गुरु चरणों में चोटी समर्पित की।
नामकरण संस्कार
आचार्यश्री ने नवदीक्षितों को नए जन्म का नया नाम प्रदान कर नामकरण संस्कार संपन्न किया। उन्होंने मुमुक्षु अश्विनी को मुनि अतुलकुमार और मुमुक्षु चेतना को साध्वी चैतन्ययशा नाम दिया।
रजोहरण प्रदान किया
आचार्यश्री ने अहिंसा ध्वज रजोहरण को आर्ष वाणी में आशीर्वाद के साथ मुनि अतुलकुमार को प्रदान किया। उन्होंने कहा कि मुनि ज्ञान दर्शन, चरित्र में वर्धमान होता रहे। साध्वी चैतन्ययशा को साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने रजारोहण प्रदान किया।
मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि दीक्षा एक बदलाव है। बिना बदले दीक्षा तक नहीं पहुंचा जा सकता। अनादि से भक्ति के मार्ग पर चलना दीक्षा है। असंयम से संयम की ओर आने से अर्हता प्राप्त हो सकती है। इस तरह की प्रवृति प्रत्येक व्यक्ति में आए। ऐसी अपेक्षा है।
मेवाड में आ रहा परिवर्तन
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने कहा कि बदलाव दुनिया का शाश्वत विषय है। समय सब को बदलने के लिए विवश कर देता है। वह स्वयं नहीं बदलता। वह देखता रहता है। मेवाड में बहुत कुछ बदलाव आ गया है। जब 51 वर्ष पूर्व मेरी दीक्षा हुई थी उस समय मेवाड का परिवेश अलग था और अब अलग है। हमें यह सोचना है कि बदलाव कहां जा रहा है। हमें भीतर से बदलाव करना है। दीक्षा एक मार्ग है संयम पर चलने का। स्वयं की खोज के लिए जिस दिशा में प्रस्थान होता है वह दीक्षा है। भारतीय संस्कृति त्याग की संस्कृति हैं इस संस्कृति में दीक्षा का बडा महत्व है। यहां दीक्षा का अर्थ है गुरु चरणों में सब कुछ समर्पित कर देना। दीक्षा लेने के बाद व्यक्ति अपने संदर्भ में कोई निर्णय नहीं ले सकता। अपनी बात गुरु को निवेदित कर सकता है पर निर्णय गुरु का होता है। उस निर्णय के अनुसार जिसमें चलने की क्षमता होती है वही तेरापंथ में दीक्षित होने का अधिकारी होता है। दीक्षा समारोह में महिला मंडल की ओर से गीत का संगान किया गया। इस अवसर पर साध्वी आरोग्यश्री, साध्वी सुमुदाय, साध्वी जिनप्रभा, मुनि शुभंकर, व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, बाबूलाल कोठारी, स्वागताध्यक्ष परमेश्वर बोहरा, दीक्षार्थी अश्विनी, दीक्षार्थी चेतना, मुनि तन्मय, मुनि हितेन्द्र ने भी विचार प्रकट किए। कन्हैया लाल छाजेड ने लिखित आज्ञा पत्र का वाचन किया। लिखित आज्ञा पत्रों को दीक्षार्थियों के अभिभावकों द्वारा आचार्यश्री के चरणों में समर्पित किए गए। संयोजन मुनि मोहजीतकुमार ने किया।
उमडा जन सैलाब
सात वर्ष बाद मेवाड की क्रांतिभूति केलवा में दीक्षा समारोह को लेकर लोगों का हुजूम उमड पडा। सवेर दस बजे तक तो यह स्थिति हो गई कि सडक पर तिल रखने तक की जगह नहीं थी। समारोह स्थल खचाखच भरा हुआ था। लोग खडे रहकर इस दीक्षा के साक्षी बनने को आतुर थे।


Tuesday, September 6, 2011

अनुशासनात्मक विकास महत्वपूर्णः आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि अनुशासन मूल मंत्र है। फल और फूल उस वृक्ष का विकास है। जब मूल नहीं बचेगा तो फल और फूल कैसे प्राप्त किया जा सकता है। तेरापंथ में अनुशासन का बहु विकास हो रहा है, जो बहुत महत्वपूर्ण है। जिस संगठन में इस ओर ध्यान दिया जाता है वह विकास के नए आयाम उद्घाटित कर सकता है।
आचार्यश्री ने उक्त उद्गार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान मंगलवार को आयोजित विकास महोत्सव को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि तेरापंथ में विकास के हर कोण पर गहराई से ध्यान दिया जाता है। हमारे यहां पर युवा और भावी पीढी को संस्कारी बनाने के लिए ज्ञान शाला का एक महत्वपूर्ण उपक्रम संचालित हो रहा है। जिस समाज और राष्ट्र के युवा और बाल पीढी में संस्कारों के विकास पर ध्यान दिया जाता है वह भविष्य को उज्जवल बना लेता है। अन्यथा उज्जवल भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
आचार्यश्री ने ज्ञान शाला के माध्यम से बच्चों में संस्कार निर्माण करने वाले कार्यकर्ताओं को साधुवाद देते हुए कहा कि व्यक्ति को नाम संपति से दूर रहकर काम पर ध्यान देना चाहिए। जब काम बोलेगा तो उसकी आवाज दूर-दूर तक अपने आप चली जाएगी। उन्होंने कहा कि जैन विश्व भारती एवं जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा जैन विद्या के प्रसार का महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। इस पर ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण ने विकास महोत्सव के मूल में आचार्यश्री तुलसी के पदाभिषेक दिवस का योग होने का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरुदेव तुलसी बहुत प्रबुद्ध और ंिचंतनशील थे। वे यह जानते थे कि किस समय कौनसा कार्य करना है। 22 वर्ष की उम्र में तेरापंथ का आचार्य बन जाना विलक्षण घटना है। सबसे ज्यादा तेरापंथ का शासन करने के बाद पद का विसर्जन कर दिया यह भी अनाशक्ति का दुर्लभ प्रयोग है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने आचार्य बनने के बाद गुरुदेव तुलसी के पदारोहण दिवस को विकास महोत्सव के तौर पर मनाने की शुरूआत कर नई सोच प्रदान की। यह महोत्सव तेरापंथ के विकास का प्रतीक है। आज के दिन सभी संस्थाओं को समीक्षा करनी चाहिए कि कितना विकास किया है। विकास परिषद् इस महोत्सव से जुडी संस्था है। यह संस्था सभी की नीति वियामक है।
संघ की मौलिकता बरकरार रहे
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने हम विकास के पथ पर आगे और तेरापंथ धर्मसंघ की मौलिकता बरकरार रहे। इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारा संघ विलक्षणता से परिपूर्ण है। यंू तो जैन समाज में कई धर्म संघ क्रियाशील है, लेकिन तेरापंथ धर्म संघ ने एक अलग ही पहचान कायम की हैं। इसे सतत् क्रियाशील बनाए रखने की आवश्यकता है। आचार्यश्री भिक्षु ने इस संघ की नींव रखते समय जिस तरह के संघ की कल्पना की थी। वह आज सभी के सामने है। वे स्वयं विलक्षण प्रतिभा के धनी थे और उसी तरह विलक्षण संघ के विकास में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि ढाई सौ वर्ष पुराने इस संघ में यंू तो अनेक आचार्यों ने इसके विकास में अपना योगदान दिया, लेकिन तीन आचार्यों आचार्यश्री भिक्षु, जयाचार्य और गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी ने इसे ऊंचाईयों तक पहुंचाने का काम किया। आज तेरापंथ धर्मसंघ विकास का प्रतीक बन गया है। संघ में विकास की अवधारणाएं गुरुदेव तुलसी के समय में बनी थी। वे कहा करते थे कि इसके विकास का जिम्मा केवल साधु-संतों का ही नहीं है। इसमें श्रावक समाज को सहभागिता का निर्वाह करने की आवश्यकता है। मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ निरन्तर विकास के पथ की ओर अग्रसर है। प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह धारणा होती है कि मैं बुलन्दियों तक पहुंच जाऊं। इसके लिए कार्य को लक्ष्य देने की आवश्यकता है। काम बिखरा होगा तो हम लक्ष्य की ओर नहीं बढ पाएंगे। उन्होंने अनावश्यक प्रवृतियों से बचने की सीख देते हुए कहा कि हम सब आचार्यश्री महाश्रमण के नेतृत्व में आगे बढ रहे है। धीरे-धीरे हम शिखर तक पहुंच जाएंगे। तेरापंथ धर्मसंघ ऐसा संघ है, जहां एक नेतृत्व है लक्ष्य है उसे अर्जित करना है। इस अवसर पर साध्वी फूलकंवर के परिजनों ने उनके जीवन से जुडी एक पुस्तक आचार्यश्री को भेंट की, जिसका विमोचन किया गया। समारोह में मुनि विश्रुतकुमार, मुनि सुखलाल, महावीरकुमार, विकास महोत्सव के संयोजक लालचंद सिंघवी ने भी विचार प्रकट किए। मुनि विजयकुमार ने गीत का संगान किया। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
शासनश्री की उपाधि से अलंकृत
आचार्यश्री महाश्रमण ने प्रवचन के दौरान चार मुनियों को उनकी कार्यक्षमता और विशेषताओं का बखान करते हुए शासनश्री की उपाधि से अलंकृत किया। इस उपाधि से सुशोभित होने वाले मुनियों में मुनि सुमेरमल सुदर्शन, मुुनि सुखलाल, मुनि पानमल एवं मुनि किशनलाल शामिल है। इनके अलावा मुनि कीर्तिकुमार और मुनि विश्रुत कुमार को आचार्यश्री ने अनिश्चितकाल तक समुचर्य कार्य की बक्शीश दी।

Monday, September 5, 2011

राजसमंद पालिकाध्यक्ष पालीवाल ने लिया आशीर्वाद

राजसमंद नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती आशा पालीवाल ने सोमवार दोपहर केलवा पहंुचकर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण से आशीर्वाद लिया। उनके साथ मनोनीत पार्षद एवं कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रदीप पालीवाल, पार्षद रमेश पहाडिया और अशोक टांक भी थे। उन्होंने भी आचार्यश्री से आशीर्वाद लिया।
पंच मेवे का भोग
केलवा में इन दिनों गणेश महोत्सव की धूम मची हुई हैं। जीएमएम ग्रुप की ओर से रविवार शाम को विशेष आतिशबाजी की गई। इसके बाद सैंकडों लोगों की मौजूदगी में आरती की गई। इधर, महाराणा प्रताप सेना और शिवदल मेवाड के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले गणेश महोत्सव को लेकर गली और मोहल्लों में आयोजन हो रहे है। सात दिवसीय गणपति महोत्सव के तहत विद्या निकेतन स्कूल के विद्यार्थियों की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। मंगलवार को भजन संध्या होगी। इसमें विनोद गुर्जर की ओर से प्रस्तुति दी जाएगी। बुधवार को गणपति की शोभायात्रा निकाली जाएगी। यह जानकारी महोत्सव के संयोजक कैलाश जोशी ने दी।

दो मुमुक्षुओं को दी जाएगी आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में दीक्षा

तेरापंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में बुधवार को तेरापंथ की उदगम स्थली के रुप में विख्यात केलवा में दीक्षा महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके साथ ही इस भूमि पर एक स्वर्णिम अध्याय ओर जुड जाएगा। दीक्षा समारोह को लेकर श्रावक समाज में उत्साह का माहौल है। इस दौरान गुजरात राज्य के सूरत निवासी और उदयपुर जिले के सायरा गांव में जन्मी मुमुक्षु चेतना और पंजाब के जगराओं निवासी मुमुक्षु अश्विनी कुमार को दीक्षा दी जाएगी। कार्यक्रम की सफल क्रियान्विति को लेकर की जा रही तैयारियां अब अंतिम चरण में है। मंगलवार दोपहर में दोनों मुमुक्षुओं का वरधोडा निकाला जाएगा।
चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी ने बताया कि सूरत निवासी मुमुक्षु सुश्री चेतना की शोभायात्रा तेरापंथ समाज केलवा के तत्वावधान में मंगलवार को दोपहर दो बजे निकाली जाएगी। मंगल भावना समारोह शाम साढे सात बजे शांतिदूत आचार्यश्री के सान्निध्य में आयोजित होगा। कोठारी ने बताया कि मुमुक्षु चेतना का जन्म 12 मई 1991 को उदयपुर जिले के सायरा कस्बे में हुआ था। बीए द्वितीय वर्ष तक अध्ययन कर चुकी इस मुमुक्षु के मन में वैराग्य का भाव 10 वर्ष की उम्र में उत्पन्न हुआ था। इन्हंे वैराग्य की प्रेरणा मुनिश्री देवराज स्वामी और उनके दादा-दादी, मम्मी-पापा से मिली। चांदमल-राजश्रीबेन कावडिया की सुपुत्री चेतना ने आचारबोध, व्यवहारबोध, संस्कारबोध, भक्तामर, श्रावक प्रतिक्रमण, श्रावक बोल, तत्व चर्चा, कालू तत्वशतक, आलम्बनसूत्र, संघीयगीत, इक्कीस द्वार,जैन तत्व प्रवेश, कर्तव्य षट्त्रिशिता, साधु प्रतिक्रमण, तेरापंथ प्रबोध और 50 श्लोक का ज्ञान अर्जित है। उन्हे प्रतिक्रमण आदेश चूरू जिले के राजलदेसर कस्बे में 8 फरवरी 2011 को और दीक्षा आदेश 9 जुलाई को राजसमंद जिले के रीछेड गांव में दिया गया था।
कोठारी ने बताया कि मुमुक्षु अश्विनी का जन्म एक सितम्बर 1983 को पंजाब जिले के जगराओं गांव में हुआ था। प्रेमचंद और संतोष जैन के परिवार में जन्में इस मुमुक्षु ने स्नातक तक शिक्षा और छट्ठी तक तत्वज्ञान द्वितीय वर्ष का ज्ञान अर्जित किया है। इन्होंने भक्तामर स्त्रोत, कल्याण मंदिर, आलम्बन सूत्र, रत्नाकर-पंचविंशिका, कर्तव्य-षद् त्रिंशिका, चतुर्विंशति-गुण,गेय गीति, पच्चीस बोल, पच्चीस बोल पर चर्चा, कालू तत्व शतक, इक्कीस द्वार, पच्चीस बोल पर चतुर्भंगी, आचार बोध, व्यवहार बोध, संस्कार बोध, तेरापंथ प्रबोध, अष्टकम् चार, विघ्नहरण ढाल, मुणिन्द मोरा ढाल, सिन्दूर प्रकार और श्रमण प्रतिक्रमण का ज्ञान अर्जित किया है। कोठारी ने बताया कि इन्होंने 11 मार्च 2011 को संस्था में प्रवेश किया था। 20 जून को चारभुजा में प्रतिक्रमण और 27 जुलाई को केलवा में दीक्षा का आदेश हुआ था।
छह दल की नियुक्ति
आचार्यश्री महाश्रमण के चातुर्मास के अर्न्तगत अणुव्रत समिति की ओर से केलवा में एक सघन नशामुक्ति अभियान चलाया जा रहा है। अणुव्रत प्रभारी मुनि सुखलाल एवं मुनि अशोक कुमार, मुनि जयंतकुमार के निर्देशन में अणुव्रत कार्यकर्ताओं के छह दल नियुक्त किए गए है। इसमें मुकेश कोठारी, प्रवीण कोठारी, रजनीश बोहरा, गौतम कोठारी, श्रीमती रेखा कोठारी, श्रीमती नीलू कोठारी को प्रमुख बनाया गया है। गांव के प्रत्येक मौहल्ले में अणुव्रत कार्यकर्ता प्रमुख व्यक्तियों को साथ लेकर घर-घर नशामुक्ति की दस्तक दे रहे है। काफी लोगों ने इनकी प्रेरणा से व्यसन त्याग दिया है। आचार्यश्री के निर्देशानुसार यह निर्णय किया गया है कि केलवा के लोगों को नशामुक्त करने के लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम चलाया जाएगा। इसके अन्तर्गत केलवा से शराब ठेका बंद करवाया जाएगा।

विद्यार्थियों में तार्किक विकास जरूरीः आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि आज के प्रतिस्पर्द्धा के युग में यह आवश्यक हो गया है कि विद्यार्थियों में तार्किकता का विकास हो। इससे उसकी बुद्धि में आशातीत विकास होगा और वह समय के साथ कदम से कदम मिलकर आगे की ओर बढ सकेगा। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाए जा रहे शिक्षक दिवस के अवसर पर शिक्षक समुदाय से आहृान किया कि वे इस बात का संकल्प लें कि देश के सर्वागीण विकास में अपनी सहभागिता का निर्वाह करते हुए ज्ञान के साथ विद्यार्थियों को संस्कारों से परिपूर्ण शिक्षा भी देने का प्रयास करेंगे, तभी इस दिवस की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
आचार्यश्री ने उक्त उद्गार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास में सोमवार को झुंझुनंू जिले के सौ गांवों से आए विद्यार्थियों और अणुव्रत शिक्षक संसद संस्थान से जुडे शिक्षकों को सबोधित करते हुए व्यक्त किए। विद्यार्थियों को सदैव नशामुक्त रहने का संकल्प दिलाते हुए आचार्यश्री ने कहा कि आज का दिन इस बात की ओर इंगित करता है कि शिक्षक और विद्यार्थी संयुक्त रुप से ज्ञान की साधना करने का प्रयास करें, ताकि देश और समाज का कल्याण हो सके। विद्यार्थियों के भविष्य का बेहतर निर्माण हो। इसकी जिम्मेदारी शिक्षक समुदाय की है।
उन्होंने संबोधि के चौथे अध्याय में उल्लेखित तर्क और बुद्धि को परिभाषित करते हुए कहा कि जहां तर्क हो वहां इसकी विवेचना करनी चाहिए और जहां तर्कातीत की स्थिति बनती हैं वहां श्रद्धा होती है। इस समय तर्क की बात करना गलत है। अहेतुगम्य और हेतुगम्य की स्थिति आत्मानुभूति का अहसास कराती है। यह तर्क का विषय है। कहां तर्क करना है और कहां इससे मुक्त होना है। यह एक विवेचन का विषय है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को हमेशा कर्म में विश्वास करना चाहिए। उसका फल क्या मिलेगा। इसमें व्यर्थ में समय गंवाने की आवश्यकता नहीं है। काम ठीक होगा तो उसका मूल्यांकन भी होगा। प्रायः कार्य इस तरह का करने की आदत डालें कि वह बोले। इसमें निराश होना कर्म में व्यवधान डालता है। कार्य में आत्मा होती है। उसकी आवाज को दूर-दराज में बैठे लोगों तक पहुंचनी चाहिए। व्यक्ति गृहस्थ जीवन जीता है। इसमें इतना समय मिल जाता है कि वह शक्ति के साथ किसी भी काम को पूरा करने में जुटे। आज आदमी क्या नहीं कर सकता। यदि मन में धुन हो तो असंभव काम भी संभव हो सकता है।
कषाय मंद की साधना करें
आचार्यश्री ने श्रावक समाज से आहृान किया कि वे कषायमंद की साधना करने का प्रयास करें। इंन्द्रियों पर भी नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। आत्मा से साक्षात्कार तभी हो सकता है जब हमारा जीवन तप, आराधना और साधना के प्रति समर्पित हो। 12 व्रतों की आराधना करते हुए श्रावक समाज आगे बढ सकता है। अहिंसा हमें जीवन दर्शन का ज्ञान कराती है। शाखाएं तो अनेक मिल जाएगी, लेकिन सभी का मूल कार्य एक है। अणुव्रत का कार्य स्कूलों में अच्छा चल रहा है। यह बडी प्रसन्नता की बात है, लेकिन इसमें ओर तेजी लाने की आवश्यकता है। लक्ष्य का निर्धारण कर आगे बढे। अंतिम लक्ष्य की तरफ गति होती है तो मंजिल अपने आप मिल जाती है।
मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि अणुव्रत गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी की देन है। समय के साथ इसने व्यापक स्थान बना लिया है। प्रेक्षाध्यान और अणुव्रत से जुडे व्यक्ति देश में कहीं भी जाए उन्हें कोई रोकता नहीं है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव तुलसी ने तेरापंथ को व्यापक रुप प्रदान किया है। संतों के आशीर्वाद के बिना आगे का काम नहीं हो सकता। अब कार्यकर्ताओं से यह अपेक्षा है कि वह अणुव्रत की अलख देशभर में जगाएं। अहिंसा और जीवन विज्ञान स्वयं का काम है। इसके सर्वव्यापीकरण के लिए श्रावक समाज में लगन की आवश्यकता है। मेवाड के कुछ गांवों में इस विषय पर काम करने की जरुरत है। इससे संघ, समाज और देश प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा। बिना किसी शोरगुल यह व्यापक बने और लोगों में जागृति आए। यह एक लक्ष्य होना चाहिए। जो व्यक्ति अभी इस कार्य में जुटे हुए हैं वे साधुवाद के पात्र है। मुनि किशनलाल ने कहा कि वर्तमान में देश के तीन सौ स्कूलों में लाखों विद्यार्थी ध्यान, साधना, तप, प्रेक्षाध्यान आदि का प्रशिक्षण ले रहे है। इनकी संख्या में वृद्धि के प्रयास में कार्यकर्ता पूरी तरह से जुटे हुए है। मुनि सुखलाल ने अहिंसा पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि छह हजार संस्थाए विश्वभर में अहिंसा के विचारों को आमजन तक पहुंचाने का काम कर रही है। कार्यकर्ताओं के पास आधुनिक साधनों का अभाव है। फिर भी वे अलख जगाने में लगे हुए है। उत्तरप्रदेश, झारखंड और बिहार सरीखे राज्यों में भी यह काम तेजी से चल रहा है। इस अवसर पर अणुव्रत शिक्षक संसद संस्थान के सहसंयोजक धर्मचंद जैन ”अनजाना” और रतनगढ के रुपचंद सेठिया ने भी विचार प्रकट किए। अहिंसा पर्यवेक्षक रमेश जीनगर ने विद्यार्थियों को संकल्प का प्रयोग करवाया। छात्रों ने अणुव्रत गीत का संगान किया। मंत्री सोहनलाल धाकड ने आभार की रस्म अदा की। संयोजन शिक्षक संसद संस्थान के अध्यक्ष भीखमचंद नखत ने किया।
नशामुक्ति के लिए शिक्षकों का दृढ संकल्प
शिक्षक समुदाय का एक प्रतिष्ठित समुदाय है। उसके पास विशिष्ठ बौद्धिक क्षमता होती है। अपनी बौद्धिक क्षमता का समुचित उपयोग करना उसका दायित्व है। सरकार शिक्षक की समुचित सुरक्षा करे यह आवश्यक है। पर यदि शिक्षक उसके बावजूद भी अपनी क्षमता का सदुपयोग नहीं करता है तो अपने दायित्व के प्रति बेपरवाह हो जाता है। अणुव्रत शिक्षक संसद अपने दायित्व के प्रति जागरुक शिक्षकों का राष्ट्रव्यापी संगठन है। राजसमंद जिले के शिक्षक भी उसके साथ जुडे हुए है। वे इस आंदोलन को पूरे जिले में फैलाएं। यह जरुरी है। उक्त विचार मंत्री मुनि सुमेरमल ने राजसमंद जिले के अणुव्रत शिक्षक संसद के शिक्षकों की संगोष्ठी के समापन समारोह में प्रकट किए। अणुव्रत प्रभारी मुनि सुखलाल ने कहा कि आज सारी दुनियां में अपराध बढ रहे है। उसके अनेक कारण है। पर गहराई से देखा जाए तो नशा प्रमुख कारण है। यह भयंकर रुप से बढ रहा है। इस पर रोक लगाई जानी आवश्यक है। इसके लिए विद्यालय सक्षम स्थल है। यदि प्रारंभ से ही उनमें सुसंस्कार भरे जा सके तो बहुत काम हो सकता है। अणुव्रत शिक्षक संसद इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। राजसमंद जिले के स्कूलों में भी नशामुक्ति का यह अभियान सशक्त रुप से चलना चाहिए। इस अवसर पर संसद के अध्यक्ष भीखमचंद नखत, धर्मचंद अंजाना, रचना तैलंग, चतर कोठारी आदि ने भी अपने विचार प्रकट किए। सभी शिक्षकों ने अत्यंत उत्साह के साथ इस अभियान में अपना योगदान प्रदान करने का दृढ संकल्प किया।
प्रतियोगिता में छाया उत्साह
तेरापंथ युवक परिषद् की ओर से रविवार रात को आयोजित पैसा ही परमेश्वर है विषयक वाद-विवाद प्रतियोगिता को लेकर प्रतियोगियों में उत्साह बना रहा। परिषद के मंत्री लक्की कोठारी ने बताया कि मुनि दिनेशकुमार के सान्निध्य में आयोजित इस प्रतियोगिता के पक्ष में प्रथम जीवन मादरेचा, द्वितीय श्रेया हिंगड, तृतीय श्रीमती राजतिलक, विपक्ष में प्रथम आयुषी हिंगड, द्वितीय पूजा दक और तृतीय श्रीमती लता मादरेचा रही। प्रतियोगिता के दौरान आचार्यश्री महाश्रमण भी मौजूद थे। कार्यक्रम में परिषद के सदस्य सहित सभी पदाधिकारी उपस्थित थे।

Saturday, September 3, 2011

केन्द्रीय मंत्री पायलट ने लिया आचार्यश्री से आशीर्वाद

केन्द्रीय दूरसंचार राज्यमंत्री सचिन पायलट (SACHIN PAILOT) शनिवार सुबह केलवा पहुंचे और यहां चातुर्मास कर रहे तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण से आशीर्वाद लिया। इस दौरान मंत्री पायलट ने संवत्सरी महापर्व, खमत खामना, तेरापंथ धर्मसंघ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, गुरुदेव आचार्यश्री द्वारा देश में चलाए गए अणुव्रत आंदोलन और आचार्यश्री महाप्रज्ञ की अहिंसा यात्रा की विस्तृत जानकारी ली। चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी एवं पदाधिकारियों ने स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका स्वागत किया। मंत्री के साथ राजसमंद जिला कांग्रेस अध्यक्ष देवकीनंदन गुर्जर भी थे।
केलवा में बना अविस्मरणीय इतिहास
शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में शनिवार को क्रांतिभूति केलवा का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया। पर्युषण महापर्व में संवत्सरी के दिन यहां पर लगभग पांच हजार श्रावक-श्राविकाओं ने विभिन्न तरह के पौषध किए। इसके अलावा व्यवस्था समिति की ओर से बाहर से आने वाले लोगों के अस्थाई ठहराव को लेकर बनाई गई कोटडियों में रहकर पौषध करने वालों की संख्या इससे अलग रही। इतनी ज्यादा संख्या में पौषध को देखकर आचार्यश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को सदैव इस तरह के उपक्रम जीवन में करते रहने की प्रेरणा दी। साथ ही कहा कि इतने छोटे कस्बे में इतनी बेहतर व्यवस्था करना व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों की मेहनत का फल है। पौषध के प्रति श्रावक समाज की उत्सुकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां देखो वहां पौषध करने वाले ही नजर आ रहे थे। कॉन्फ्रेन्स हॉल, पांडाल, घरों के बाहर और भीतर वे ही नजर आ रहे थे। सुबह नौ बजे भोजनशाला में सामूहिक पारणा का आयोजन किया गया। इसमें साढे छह हजार का पारणा कराया गया।
शिक्षकों की कार्यशाला आज
अणुव्रत आंदोलन नैतिकता का एक असाम्प्रदायिक अभियान है। शिक्षकों के लिए अणुव्रत शिक्षक संसद का एक राष्ट्रीय अभियान अणुव्रत के अर्न्तगत चलाया जा रहा है। राजसमंद जिले के शिक्षकों की एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन रविवार को आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में अणुव्रत प्रभारी मुनि सुखलाल एवं सहप्रभारी मुनि अक्षयप्रकाश के निर्देशन में होगा। संसद के अध्यक्ष भीकमचंद नखत ने बताया कि इस कार्यशाला में जिला शिक्षा अधिकारी राकेश तैलंग एवं घनश्याम दैया भी भाग लेंगे। इसमें अणुव्रत के विविध पक्षों पर विचार-मंथन किया जाएगा।


कषाय मंद करने का पर्व है क्षमा-याचनाः आचार्यश्री महाश्रमण


कषाय मंद करने का पर्व है क्षमा-याचनाः आचार्यश्री महाश्रमण
केलवा में चातुर्मास, श्रावक समाज का उमडा हुजूम, लगभग पांच हजार श्रावक-श्राविकाओं ने पौषध कर रचा कीर्तिमान, दिनभर चला खमत खामना का दौर, केन्द्रीय दूरसंचार राज्यमंत्री पायलट ने लिया आचार्यश्री से आशीर्वाद, शिक्षकों की कार्यशाला आज

तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि आज हमारे सामने वर्ष का सबसे बडा पर्व आया है। क्षमा याचना का यह महापर्व व्यक्ति के मन के भीतर व्याप्त कटु वचनों को शुद्ध करने का एक उपक्रम है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी लोगांे से अतीत में जाने अनजाने हुई त्रुटियों के लिए खमत खामना कर क्षमा मांगे और आने वाले समय के लिए बेहतर करने का प्रण लें। उक्त उद्गार आचार्यश्री ने यहां तेरापंथ समवसरण के खचाखच भरे पांडाल में शनिवार को क्षमापना दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में हजारों की तादाद में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि उत्तराध्यन में उल्लेखित है कि क्षमापना करने से चित्त में प्रसन्नता की अनुभूति होती है। सभी जीवों के साथ मैत्री का भाव रखने की आवश्यकता है। आत्मा का भाव पुष्ट करने की दृष्टि से भाव की विशुद्धि होना जरुरी है। हमने पिछले आठ दिन के भीतर पर्युषण महापर्व के दौरान धर्म आराधना, तप, उपवास और साधना कर जीवन को धार्मिक बनाने का अच्छा प्रयास किया है। आज उसका प्रयोगात्मक विश्लेषण का समय है। गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञ दोनों से वे प्रत्यक्ष रुप से वंचित है, लेकिन परोक्ष से उनका सान्निध्य मिला हुआ है। हमारे सिर पर तेरापंथ धर्मसंघ का साया है। आत्मा हमेशा हमारे साथ है। यह हमारा सौभाग्य है। यह व्यवहारिक रुप से धर्मसंघ है। क्षमापना पर्व को लेकर आचार्यश्री ने साधु-साघ्वियों, श्रावक-श्राविकाओं, देशभर में चातुर्मास कर रहे मुनियों, साध्वियों, तेरापंथ धर्मसंघ, चातुर्मास व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों सहित अन्य से खमत खामना की। इस दौरान पहले साध्वियों ने साधुओं से और उसके बाद साधुओं ने साध्वियों से वर्षभर के दरम्यान प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से हुई त्रुटियों के लिए खमत खामना की। इसके बाद श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्यश्री से क्षमायाचना की।
जहर को अमृत बनाती है क्षमा
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने विभिन्न कठिनाईयों के दौर से गुजरने के बाद एवरेस्ट पर पहुंचने वाले व्यक्ति को सफलता मिलती है तो वह घ्वजारोहण करता है। आज हमें आठ दिन के पर्युषण की समाप्ति पर इसी तरह की अनुभूति हो रही है। इसलिए हमें भी ध्वज फहराने की आवश्यकता है। कल हमने संवत्सरी मनाई और पूरी रात आत्मलोचन और आत्म निरीक्षण किया। यह महान पर्व है। इसकी तुलना किसी अन्य पर्व से नहीं की जा सकती। हमारे मन में व्याप्त अहंकार के पहाडों को ढहाने की व्यक्ति को आवश्यकता है। क्षमा व्यक्ति के भीतर फैले जहर को अमृत बनाने का माध्यम है। हमारे यहां तीन चिकित्सा पद्धति का सहारा है। एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद। क्षमा भी एक चिकित्सा है, जो व्यक्ति को भीतर से स्वस्थ और मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि हमें कायाकल्प की प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है। हमारा जीवन शांति की साधना के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। मुख्य संयोजिका साध्वी विश्रुतप्रभा ने कहा कि आज के परिवेश में क्षमाशील व्यक्ति मैत्री के पथ पर जा सकता है। जिस तरह दो हृदयों को जोडकर कुल की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया जाता है उसी तरह क्षमा हमें परिवार, समाज और देश के विकास की ओर बढाती है। मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि क्षमापना को मन को टटोलने का समय बताते हुए कहा कि हमारी पर्युषण महापर्व के दौरान भावना बनी रही। उसकी आज के दिन आत्मालोचन करने की आवश्यकता है। हम अर्न्तःभाव से क्षमा याचना और आचार्य की ओर से इंगित आराधना में तल्लीन रहने का प्रयास करें। हमारे गुरुप्रवह बडे शलीन है। हमसे कोई त्रुटि हो जाती है तो कहते नहीं, बल्कि महसूस करते है। हमें गुरु की आराधना और उनकी दृष्टि पर ध्यान देने की आवश्यकता है। आज इस चातुर्मास का पूवार्द्ध पूरा हो चुका हैं। अब उतरार्द्ध शुरू होने वाला है। यह चातुर्मास मेवाड के लिए ऐतिहासिक बने। इसके प्रयास करने की जरूरत है। मुनि दिनेश कुमार ने गीत का संगान किया। इस अवसर पर व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, स्वागताध्यक्ष परमेश्वर बोहरा, महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी, बाबूलाल कोठारी, लक्की कोठारी, लवेश मादरेचा, तेरापंथ महिला मंडल की अध्यक्ष फूलीदेवी कोठारी, मंत्री रत्ना कोठारी, अखिल भारतीय कार्यकारिणी की सदस्य मंजूदेवी बडोला, रमेश बोहरा आदि ने विचार व्यक्त किए। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।

Sunday, August 28, 2011

वाणी श्रवण से मिल सकता है वैराग्यः आचार्यश्री महाश्रमण

शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि मनुष्य में धार्मिक कार्यक्रमों से प्रवाहित होने वाली वाणी से भी वैराग्य का भाव उत्पन्न हो सकता है। नवसार ने साधुओं की संगति में आकर उनके मुखवृंद से धर्म की बातों को श्रवण किया और सम्यक् को प्राप्त किया। ऐसा पुण्य आत्माओं में ही संभव है। आचार्यश्री ने यह उद्गार रविवार को तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान पर्युषण महापर्व के तीसरे दिन दैनिक प्रवचन में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे आगमों के स्वाध्याय को याद करने का प्रयास करें। इससे हमारी वाणी पर नियंत्रण होगा और विचारों में शुद्धता आएगी। अच्छे विचार आचार का प्रादुर्भाव होगा और व्यवहार में आशातीत परिवर्तन का बोध होगा। पांच कर्मों में बंध हो सकता है। इसके लिए संयम रखने की आवश्यकता है। इससे कर्मों की निर्जरता हो सकती है। जिस तरह आदमी का भाव होगा उसी के अनुरुप वह कर्मों के बंधन में बंधता है। कर्म वह चेतना है जो आकर्षण को पैदा करता है। इसे दूर किया जाना चाहिए। उन्होंने तपस्या को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि मनुष्य को इसका पालन करने के लिए संयम बरतने की जरूरत है। तपस्या हमें निर्मलता की ओर ले जाती है। हमारा स्वभाव निर्मल होगा तो परिवार में भी शांति की अनुभूति होगी। नैतिकता, संयमता, शालीनता और व्यवहार में मधुरता जीवन को सुन्दर
बनाती है। नेक व अच्छे कर्म करने में विश्वास करे। मन ही मनुष्य के बंधन और कर्मों को उजागर करता है। जैसा भाव होगा, मनुष्य का कर्म भी उसी अनुरुप सामने आएगा। जन्म-मरण का चक्र हमेशा चलता रहता है। जिस व्यक्ति में धर्मयुक्त और त्याग की भावना का समावेश होता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
उन्होंने कहा कि श्रावक समाज स्वाध्याय को कंठस्थ करने की भावना मन में जागृत करें। इसे करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। यह हम अंधेरे में भी कर सकते है। अच्छा जीव तभी जी सकता है, जब वह बाहरी गतियों को दमन करें। देवता मनुष्यों के पास भी आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि वह धर्मयुक्त हो। जिस मनुष्य के चित्त में निर्मल का भाव नहीं हैं और जो वर्तमान जीवन के भौतिकता से भरे जीवन के सुख को छोड नहीं सकता। उसे मोक्ष मार्ग की प्राप्ति नहीं होती। इसके लिए मनुष्य को माया- मोह के परित्याग के साथ सांसारिक दलदल दूर रहकर निर्मल भाव से ध्यान आराधना करनी होगी तभी उसका मानव जीवन सार्थक हो सकेगा। उन्होंने भगवती सूत्र आगम को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि साधु के मन के भीतर चंदन का लेप लगा है। मनुष्य अपने बाहरी काया पर इस लेप को लगाने का प्रयास करें।
कर्म निर्धारित करते है गति
आचार्यश्री ने कहा कि एकाग्रचित्त होकर ध्यान-साधना करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। जो व्यक्ति आत्मीयता के बलबूते आराधना करता है उसे निर्वाण की प्राप्ति होती है। संबोधि काल में जिस व्यक्ति का ध्यान धर्म और समाज की ओर जाग्रत होता है उसे निर्वाण का मार्ग अवश्य मिलता है। इसके लिए आवश्यक है कि वह मन को स्थिर रखकर ईश्वर का ध्यान करें।
यह कर्मों का स्वभाव है कि वर्तमान में हम कौनसी गति के प्राणी है। इसकी विवेचना कर सकते है। मृत्यु के बाद आदमी की आत्मा किस रुप में जन्म लेगी। इसका भी एक विधान है। मनुष्य अगले जन्म में पुनः मनुष्य के रुप में अवश्य जन्म लेता हैं, लेकिन देवता वापस देव रुप में जन्म नहीं ले सकता है। उन्होंने तीन कर्मों से सदैव बचने का आहृान करते हुए गति को भी विधान बताया और कहा कि मनुष्य के कर्म में जैसा भाव होगा, उसे कर्मों का वैसा ही फल मिलता है। आयुष कर्म से अगली गति का निर्धारण संभव हो सकता है। मानव जगत और विभिन्न समाजों से आहृान किया कि वे पानी के महत्व को समझते हुए इसके अपव्यय को रोकने की दिशा में अभियान चलाएं। पानी का दुरुपयोग इसी तरह से होता रहा तो आने वाली पीढी को बडी कठिनाईयों का सामना करना पडेगा। आज की स्थिति को देखते हुए हमें थोडे पानी में ज्यादा कार्य करने के प्रति जागरूकता लानी होगी। हमें स्नानादि करते समय कम पानी उपयोग करने की आदत विकसित करने की महत्ती आवश्यकता है। कम पानी में किस तरह से ज्यादा कार्य संपादित किए जाए। इस ओर मनन करने की जरूरत है। सभी कार्यों के निष्पादन के बाद यदि कुछ पानी शेष रह जाए तो उसे फेंके नहीं, बल्कि उसका संग्रहण करके पुनः उसका उपयोग करने की आदत डालें।
सर्वज्ञान का खजाना है भगवती सूत्र
मंत्री मुनि सुमेरमल ने भगवती सूत्र को सर्वज्ञान के खजाने के रुप में परिभाषित करते हुए कहा कि वर्तमान में उपलब्ध आगमों में भगवती सूत्र सबसे बडा है। इसे पढने से जीव अजीव को सतद्रव्य का ज्ञान होता है। यह ऐसा गं्रथ है जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में रचा गया है। इसमें 36 हजार प्रश्न और उत्तर है। इससे हमारे ज्ञान में आशातीत वृद्धि होती है। इसमें अनेक विषयों के समावेश कर विवेचन किया गया है। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।


अन्ना की जीत पर जश्न व रैली निकाली

गांधी वादी अन्ना हजारे की तीनो मुद्धो पर सहमति बनने पर एवं अनशन तोडे जाने की जानकारी मिलने पर जन लोकपाल सत्याग्रह समिति के बेनर तले अन्ना समर्थको द्वारा जश्न मनाया गया इस अवसर पर भव्य आतिस बाजी जगह जगह करते हुए रैली निकाली गई। रैली में अन्ना हजारे जिन्दाबाद,जब तक सुरज चॉद रहेगा -अन्ना तेरा नाम रहेगा इत्यादि नारे लगाते हुए युवा नागरिक चल रहे थे। रैली जल मन्दिर से शुरू होकर सुरज पोल,चारणा की खाली, सदर बाजार होते हुए छतरी चौक,मादरेचा कि गली,बडी स्कुल,भिक्षु विहार, दोलत कोलानी होते हुए पुन जल मन्दिर पहुची। जल मदिर पहुच कर सभा मे परिवर्तित हो गई। जन लोकपाल सत्याग्रह समिति राजसंमद के सदस्य कैलाश जोशी ने कहा कि यह देश की जनता की जीत है,अन्ना का अन्ना का अनशन खत्म हुआ है आधी लडाई अभी बाकी है।लोकसभा में अन्ना के प्रस्ताव के पास हासेने को ऐतिहासिक कदम बताया इसमें सरकार ही नही अपितु पुर्ण ससंद नतमस्तक हो गया जो जनतन्त्र की जीत है,देश वासियो की जीत है इस अवसर पर कैलाश जोशी,रेवानाथ मिक्षा,सुरेश सोनी,मनोज झावडीया, देवेन्द पालीवाल, किशन पालीवाल,गोकुल सावरिया,आनन्द जोशी,जगदीश नुवाल, विनोद पालीवाल, लाला सोनी,रमेंश बोराणा,बसंत पालीवाल,सानिध्य पालीवाल सहित हजारो अन्ना समर्थक उपस्थित थे।

Saturday, August 27, 2011

केलवा में दीक्षा महोत्सव 7 को

तेरापंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में आगामी सात सितम्बर को तेरापंथ की उदगम स्थली के रुप में विख्यात केलवा में दीक्षा महोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव के दौरान गुजरात राज्य के सूरत निवासी मुमुक्षु चेतना और पंजाब के जगराओं निवासी मुमुक्षु अश्विनी कुमार को दीक्षा दी जाएगी। कार्यक्रम की सफल क्रियान्विति को लेकर प्रारंभिक तैयारियां शुरू हो गई है।
चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी ने बताया कि सूरत निवासी मुमुक्षु सुश्री चेतना की शोभायात्रा तेरापंथ समाज केलवा के तत्वावधान में 6 सितम्बर को दोपहर दो बजे निकाली जाएगी। मंगल भावना समारोह शाम साढे सात बजे शांतिदूत आचार्यश्री के सान्निध्य में आयोजित होगा। कोठारी ने बताया कि मुमुक्षु चेतना का जन्म 12 मई 1991 को उदयपुर जिले के सायरा कस्बे में हुआ था। बीए द्वितीय वर्ष तक अध्ययन कर चुकी इस मुमुक्षु के मन में वैराग्य का भाव 10 वर्ष की उम्र में उत्पन्न हुआ था। इन्हंे वैराग्य की प्रेरणा मुनिश्री देवराज स्वामी और उनके दादा-दादी, मम्मी-पापा से मिली। चांदमल-राजश्रीबेन कावडिया की सुपुत्री चेतना ने आचारबोध, व्यवहारबोध, संस्कारबोध, भक्तामर, श्रावक प्रतिक्रमण, श्रावक बोल, तत्व चर्चा, कालू तत्वशतक, आलम्बनसूत्र, संघीयगीत, इक्कीस द्वार,जैन तत्व प्रवेश, कर्तव्य षट्त्रिशिता, साधु प्रतिक्रमण, तेरापंथ प्रबोध और 50 श्लोक का ज्ञान अर्जित है। उन्हे प्रतिक्रमण आदेश चूरू जिले के राजलदेसर कस्बे में 8 फरवरी 2011 को और दीक्षा आदेश 9 जुलाई को राजसमंद जिले के रीछेड गांव में दिया गया था।
कोठारी ने बताया कि मुमुक्षु अश्विनी का जन्म एक सितम्बर 1983 को पंजाब जिले के जगराओं गांव में हुआ था। प्रेमचंद और संतोष जैन के परिवार में जन्में इस मुमुक्षु ने स्नातक तक शिक्षा और छट्ठी तक तत्वज्ञान द्वितीय वर्ष का ज्ञान अर्जित किया है। इन्होंने भक्तामर स्त्रोत, कल्याण मंदिर, आलम्बन सूत्र, रत्नाकर-पंचविंशिका, कर्तव्य-षद् त्रिंशिका, चतुर्विंशति-गुण,गेय गीति, पच्चीस बोल, पच्चीस बोल पर चर्चा, कालू तत्व शतक, इक्कीस द्वार, पच्चीस बोल पर चतुर्भंगी, आचार बोध, व्यवहार बोध, संस्कार बोध, तेरापंथ प्रबोध, अष्टकम् चार, विघ्नहरण ढाल, मुणिन्द मोरा ढाल, सिन्दूर प्रकार और श्रमण प्रतिक्रमण का ज्ञान अर्जित किया है। कोठारी ने बताया कि इन्होंने 11 मार्च 2011 को संस्था में प्रवेश किया था। 20 जून को चारभुजा में प्रतिक्रममण और 27 जुलाई को केलवा में दीक्षा का आदेश हुआ था।





सम्यक् ज्ञान सबसे बडा रत्नः आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने सम्यक् ज्ञान को सभी रत्नों में सबसे बडा बताते हुए कहा कि पृथ्वी पर तीन रत्न माने गए है पानी, अन्न और संयमित वाणी, लेकिन सम्यक् हमें मोक्ष के मार्ग की ओर प्रशस्त करता है। सम्यक् दर्शन के सामने अन्य सभी रत्न तुच्छ है। हम जितनी धर्म की आराधना और उपासना करने में तल्लीन रहेंगे उतनी ही सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होगी। अभी पर्युषण का समय चल रहा है। इन दिनों में जितनी साधना की जाए उतनी ही व्यक्ति के लिए अच्छी है। आचार्यश्री ने उक्त उद्गार शनिवार को यहां तेरापंथ समवसरण में पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन स्वाध्याय दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए हजारों श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन प्रस्तुत करते हुए कहा कि हम लागे जिस लोक में जीव का निर्वाह कर रहे है। वह जंबू द्वीप है। इस लोक में तीर्थंकर नहीं हो ऐसा नहीं हो सकता। 20 तीर्थंकर तो होंगे ही। इससे भी ज्यादा 170 तीर्थंकर हो सकते है। जैन वागडम में उल्ल्ेखित है कि जो व्यक्ति कर्माें से मुक्त होता है उसे निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है।
आचार्यश्री ने कहा कि सम्यक् दर्शन है तो सम्यक् ज्ञान है। यर्थाथ दृष्टि ही हमें सम्यक् दर्शन का बोध कराती है। जिसे ज्ञान और दर्शन प्राप्त नहीं होता उसे कर्मों से मुक्ति नहीं मिल सकती है। जो इनमें युक्त नहीं होता उसे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाता। नव तत्व को परिभाषित करते हुए श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे इसका ज्ञान अर्जित करने का प्रयास करें। आत्म साधना, तप और संयम करने से भी सम्यक् की प्राप्ति की जा सकती है। इसके अलावा किसी के माध्यम से मिलने वाले ज्ञान से भी इसे प्राप्त किया जा सकता है। सांसारिक जगत में यदा कदा मिलने वाले धोखे को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि इससे व्यक्ति को कठिनाई होती है। वह प्राणांत तक भी पहुंच सकता है। उन्होंने एक वृतांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि मार्ग में मिलने वाले साधुओं की सेवा अपने हाथों से करने की प्रवृति से भी आत्मा की अनुभूति का अहसास होता है। नवसार को साधुओं ने धर्म की बातें बताई। इन बातों को सुनकर उन्हें सम्यक की प्राप्ति हो गई। हालांकि उन्हें इसका बोध अल्प समय तक ही रहा, लेकिन ज्ञान मिल गया। परिमाणित भाव है तो व्यक्ति साधु का वेश धारण कर सकता है। वह सभी साधु-साध्वियों का नेता बन सकता है।
विशेष स्वाध्याय करने की आवश्यकता
आचार्यश्री ने स्वाध्याय दिवस की महत्ता को परिभाषित करते हुए कहा कि इसमें विशेष स्वाध्याय करने की आवश्यकता है। प्राचीन साहित्य में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि बारह प्रकार के तत्व उपदिष्ट है। स्वाध्याय करने से व्यक्ति को आलोक मिलता है। उसके अंधकारमय जीवन में प्रकाश फैलता है। इससे ज्ञान में अपेक्षाकृत वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री तुलसी ने अनेक साहित्यों को कंठस्थ कर अपने ज्ञान में आशातीत वृद्धि की थी। इसी क्रम में आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने भी साहित्यों को कंठस्थ किया। इसी परपंरा को आज साधु-साध्वी आगे बढाने में लगे हुए है। श्रावक-श्राविकाओं को भी चाहिए कि वे साहित्य को याद कर अपने ज्ञान की क्षमता को बढाएं। उत्तराध्यन का 29 वां अध्याय पठनीय है। प्रत्येक व्यक्ति को इसका पाठन करना चाहिए और हो सके तो
इसे याद करने का प्रयास करना चाहिए। पूरा होने के बाद इसका पुनरार्वतन करने की आवश्यकता है। उन्होंने 32 आगमों को पठनीय बताते हुए कहा कि स्वाध्याय करने से संयम और मन में निर्मलता का बोध होता है। जीवन में स्वाध्याय का प्रयास करने की आवश्यकता है। इस अवसर पर मंत्री मुनि सुमेरमल ने भी प्रवचन प्रस्तुत किया। आचार्यश्री के प्रवचन सुनने के लिए श्रावक-श्राविकाओं की भीड उमड रही है। पांडाल में सुबह स्थिति यह है कि लोगों को बैठने की जगह तक नहीं मिल रही है। मुनि किशनलाल ने संस्कार निर्माण प्रतियोगिता की जानकारी दी। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।

Friday, August 26, 2011

धर्म आराधना का श्रेष्ठ समय पर्युषण: आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि पर्युषण का समय धर्म आराधना करने के लिए श्रेष्ठ है। इन आठ दिनों के दरम्यान श्रावक समाज विशेष रुप से साधना करने में तल्लीन रहें, ताकि विकृतियों को नाश हो सके। श्रावण-भादौ में विशेष रूप से धर्म की साधना करने की आवश्यकता है। इन दो माह में होने वाली धार्मिक क्रिया से मन के साथ शरीर को भी शुद्ध किया जा सकता है। पहला दिन खाद्य संयम दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। हमें अपनी उच्च साधना के लिए आहार पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है।
आचार्यश्री यहां तेरापंथ समवसरण में शुक्रवार को शुरू हुए पर्युषण महापर्व के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में देशभर से आए श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी धर्म आराधना का क्रम व्यवस्थित बना रहें।एकागचित्त होकर की गई साधना का फल प्राप्त करने के लिए हमें इसके प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है। संवत्सरी मूल पर्व है। इससे पहले सात दिन जोडे गए है। इसके पीछे किसी की भी भविष्य को देखकर कुछ भी मंशा रही हो, लेकिन जिसने भी पर्युषण पर्व मनाने का आगाज किया, वह साधुवाद का पात्र है। आचार्यश्री ने पर्युषण के दौरान प्रातःकालीन सत्र में शुरू हुए विभिन्न उपक्रमों की जानकारी देते हुए भगवान महावीर को नमन किया और महावीर के चरणों में श्रद्धा के पुष्प गीत का संगान कर अपने प्रवचन का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर नाम नहीं अपितु एक आत्मा है। उन्होंने परमात्मा बनने के लिए न जाने कितने वर्षों तक धर्म की साधना की और मोक्ष को प्राप्त हुए और तीर्थंकर बन गए। उनका चरित्र हमें यह शिक्षा देता है कि व्यक्ति आत्मा की साधना करते करते परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। आत्मा कभी एक शरीर में नहीं टिकती। वह एक योनि का शरीर समाप्त होने पर दूसरे शरीर में समाहित हो जाती है। जन्म मरण का यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है।
सम्यकत्व की प्राप्ति महत्वपूर्ण
आचार्यश्री ने आत्मा में सम्यकत्व की प्राप्ति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हमारा जीवन यहीं तक सीमित होकर रहने वाला नहीं है। इसके आगे भी मोक्ष का मार्ग है। उसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपना अधिकांश समय संयम और साधना में लगाने की आवश्यकता है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग हमारे लिए प्रशस्त करता है। जीवन को अच्छा बनाने के लिए सम्यक् का ज्ञान होना आवश्यक है। यह हमारी आत्मा का शास्वश्त है। इससे आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव होती है। यह पुस्तक अध्ययन या चलचित्र देखने से संभव नहीं बल्कि धर्म की आराधना, तप, साधना करने से संभव होती है। व्यक्ति को हमेशा धर्म मे रम जाना चाहिए। इसी से उसका कल्याण हो सकता है।
जीवन शैली को उजागर करता है पर्युषण महापर्व
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने कहा कि जैन परपंरा में पर्युषण महापर्व एक महान पर्व के रूप में प्रख्यात है। इसका जैन परंपरा में क्या महत्व है। यह बताने की कतई आवश्यकता नहीं है, तथापि इतना अवश्य कह सकते है कि यह जैन समाज की जीवन शैली को उजागर करता है। इसके प्रारंभ होने से पहले ही जैनेत्तर लोग त्याग-तपस्या और संयम की चेतना जागृत करने में तल्लीन हो जाते है। उनकी जीवन शैली में अपेक्षित बदलाव आना शुरू हो जाता है। यह अच्छा संकेत है। एक तरह से यह कहना भी उचित होगा कि यह हमें रूपांतर की ओर ले जाता है। आचार्यश्री तुलसी ने भी इस पर्व को महापर्व की संज्ञा दी थी। यह सभी पर्वों का राजा है। बारह मास की प्रतीक्षा के बाद आने वाला यह महापर्व जैनेत्तर लोगांे में विशिष्ट स्थान रखता है।
साध्वी प्रमुखा ने कहा कि जैन शास्त्रों में चातुर्मास को पोशाक के रूप में परिभाषित किया जाता है, जबकि शेष आठ माह को अष्टांग माना जाता है। पर्युषण पर्व को आभूषण की संज्ञा दी गई है। साधु के लिए इसका बडा महत्व है। कालांतर में इसके प्रति केवल साधु-साध्वियां ही सजग रहते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि श्रावक-श्राविकाएं भी इसे लेकर काफी गंभीर नजर आती है। श्रावक समाज के साथ कब से और क्यों इस तरह का गहरा संबंध बना। इस पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति में यंू तो अनेक पर्व मनाए जाते हैं कुछ भौतिकता से ओतप्रोत भी होते है। नाच गाना इत्यादि भी देखने को मिलता है, लेकिन पर्युषण ऐसा पर्व है जिसमें यह सब कुछ नहीं होता। यह अलौकिक है इसमें आराधना भी अलौकिक होती है। त्याग और प्रत्याखान का पर्व है। एक तरह से यह भी कहना उचित होगा कि यह धर्म के द्वार से प्रवेश कराने का मार्ग है। इससे शांति, मुक्ति, आर्जव और मार्डव की अनुभूति होती है। इसके प्रारंभ और वर्तमान स्वरूप में काफी अंतर आया है। इस पर गहन विचार करने की आवश्यकता है। इसे चातुर्मास की स्थापना का उपक्रम भी माना गया है।
उन्होंने कहा कि हम तो अध्यात्म के यात्री है। प्रायः देवी देवताओं और तीर्थस्थलों पर जाने का उपक्रम बना रहता है अभी केलवा में देखा कि श्रद्धालुओं को हुजूम सेंकडों किलोमीटर की यात्रा करते हुए जा रहा है। पूछने पर उन्होंने कहा कि रूणेचा जा रहे है। पर हमारा सफर इनसे कहीं अधिक लंबा है। हम बीज से बरगद का रूप अख्तियार करते हैं असत्य से सत्य, अंधकार से आलोक और मृत्यु से अमृत कलश सीखने की यात्रा करते है। श्रावक समाज के जुडने से यह जाहिर होता है कि इसका कितना महत्व है। चातुर्मास के तीन स्वरूपों की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि यह तीन तरह के होते है। पहला जघन्य चातुर्मास जो 70 दिन का होता हैं दूसरा मध्यम जो चार माह और तीसरा उत्कृष्ठ जो छह माह का होता है। इनमें से पहले दो अक्सर देखने को मिलते है। तीसरा यदा-कदा ही होता है। इसके पीछे मूल कारण यह होता है कि कोई भी साधु-संत एक ही स्थान पर छह माह तक नहीं ठहरता। उन्होंने कहा कि शरीर ही ब्रह्नाण्ड है। इसमें सत्य के साथ ज्योति पर्व, अमृत पर्व निहित है। इसे खोजने की ओर कहीं जरूरत नहीं है। यह हमारी काया में ही विद्यमान है। इसे वहीं ढंूढने का प्रयास करने की आवश्यकता है।
मंत्री मुनि सुमरेमल ने कहा कि पर्युषण के दौरान विभिन्न विषयों पर चिंतन-मनन होगा और कई विषय हमारे सामने आएंगे। इसमें जैनागम भगवती का आना बहुत अच्छा माना गया है। इसमें जीवन चरित्र सहित अनेक विषयों की व्याख्या की गई है। इसमें प्रत्येक आगम का खजाना भरा पडा है। यह स्वयं में बहुत बडी है। 11 अंगों में से भगवती को पांचवा स्थान दिया गया है। वहीं 84 आगम प्राचीन ग्रंथों के रूप में स्वीकार किए गए है। इस अवसर पर सांयों का खेडा निवासी सरिता कोठारी की 11 की तपस्या, पुष्पा मादरेचा को 8 की तथा भाण निवासी शांताबाई को 6 की तपस्या का प्राख्यान दिया गया। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
आचार्यश्री महाश्रमण ने कराया केशलोंच
तेरापंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने प्रातः केशलोंच करवाया। बिना किसी आधुनिक उपकरण से हाथ से केशलांच करवाते देख श्रद्धालुओं से जयकारों से गगन गुंजायमान हो उठा। जैन धर्म में कष्ट सहिष्णुता की अनेक कसौटियों में एक केंशलोंच को निर्जरा के लिए माना जाता है। आचार्यश्री के लोचन के दौरान मुनिजनों ने सस्वर स्वाध्याय कर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। लोंच के पश्चात् श्रद्धालुओं ने सुसवृच्छा की आर्यप्रवर के निर्जरा में सहभागिता के लिए स्वाध्याय की प्रेरणा दी।
जयाचार्य आध्यात्म वेत्ता पुरुष थे
आचार्यश्री महाश्रमण ने तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य जयाचार्य के निर्वाण दिवस का उल्लेख करते हुए कहा कि जयाचार्य अध्यात्म वेत्ता पुरुष थे। उन्होंने तेरापंथ के विकास में चार चांद लगाए। वे स्वाध्याय को ज्यादा महत्व देते थे। उनके द्वारा रचित लाखों राजस्थानी साधना को समृद्ध बना रहे है।

Thursday, August 25, 2011

पर्युषण में बढाएं अपनी साधनाः आचार्यश्री महाश्रमण

तेासपंथ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने श्रावक समाज से आहृान किया कि वे शुक्रवार से शुरु हो रहे पर्युषण महापर्व के दरम्यान भौतिक संसाधनों से परे रहकर संयम की आराधना में अपना चित्त लगाएं और अपनी साधना में आशातीत इजाफा करने का प्रयास करें। वर्षभर में महज एक मर्तबा जीवन में आने वाला यह महापर्व व्यक्ति के अर्न्तःमन को पूरी तरह से धर्ममय बनाता है। एक तरह से यह भी कह सकते है कि यह संयम की आराधना का समय है। इसका पूरा-पूरा लाभ अर्जित करने की आवश्यकता है।
उक्त उद्गार आचार्यश्री ने यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान गुरुवार को दैनिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने हजारों की संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि लोग धर्म की साधना करने के लिए घरों की सुख-सुविधाओं को छोडकर यहां उपासना कर रहे है। अस्थाई रुप से निर्मित कुटीर में रहकर साधारण जीवन व्यतीत करने में लगे हुए है। धर्मोपासना कर रहे है। यह सिनेमा, चलचित्र टेलीविजन और भौतिक संसाधनों से यह दूर है। इनकी ओर से की जा रही आराधना उन्हें कुछ अंशों में साधु जीवन व्यतीत करने की दिशा में अग्रसर कर रही है।
उन्होंने कहा कि संयम का अभ्यास करना और धर्म आराधना में तल्लीन रहना भी एक साधना है। व्यक्ति को अपने रहन-सहन, खान-पान के प्रति संयमता बरतने की आवश्यकता है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने भी कालातंर में पर्युषण महापर्व की महत्ता को जानते हुए इस दौरान पूरी तरह से धर्ममय जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी थी। उसी की पालना करते हुए आज पर्युषण को आराधना महाशिविर के रुप में मनाया जाने लगा है। इसलिए श्रावक-श्राविकाओं को चाहिए कि वे इस महापर्व के आठ दिनों में अपने जीवन को पूरी तरह से संयमित रखने का प्रयास करें।
फिर भी लोग जमीन से उगने वाली सब्जियों यथा मूली, आलू, गाजर, जमीकंद इत्यादि का प्रयोग करने से बचे। सूर्यास्त के बाद भोजन करने की प्रवृति को त्यागने की आवश्यकता है। उन्होंने समता की साधना को पुष्ट करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि पर्युषण में साधना का अच्छा समय है। केलवा चातुर्मास में इस दौरान प्रतिदिन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की रुपरेखा तय हो चुकी है। बस आवश्यकता है पूरे दिन होने वाले कार्यक्रमों का लाभ उठाने की।
कषाय विजय की साधना करें
आचार्यश्री ने व्यक्तियों के मन में व्याप्त होने वाले कषायों को मंद करने का आहृान करते हुए कहा कि इस पर विजय पाना भी एक तरह से साधना है। आदमी जितना विकृतियों से दूर रहने का प्रयास करेगा उतनी ही उसकी धार्मिक भावना पुष्ट होगी। इस पर नियंत्रण हो जाता है तो व्यक्ति को आत्मा की अनुभूति का अहसास होता है। संबोधि के चौथे अध्याय में उल्लेखित सहजानंद को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि यह वाणी का विषय नहीं हैं इसे अनुभव किया जाता है। यह अपने आप में विशिष्ट है। किसी व्यक्ति से बात करने के लिए भी एक तरीका होता है। बात में सारगर्भिता न हो तो सामने वाला प्रभावित नहीं हो सकता। व्यक्ति यह सोचता है कि जैसा मैंने दिया उसी के अनुरुप उसे मिले। यह संभव नहीं है। उन्होंने एक वृतांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन में जिस तरह से मनुष्य स्वप्न को देखता है, लेकिन उसे किसी के हाथ पर रखकर साबित नहीं कर सकता कि जो उसने देखा है वह सही है। उसी तरह आत्मा का अनुभव किया जा सकता है, उसे दिखाया नहीं जा सकता। इसी तरह सहजानंद की अनुभूति ही की जा सकती है। मन संयमित रखने से आत्मानंद को भोगा जा सकता है। अर्थात् उसका आनंद उठाया जा सकता है। व्यक्ति के जीवन में स्वयं के ऊपर कभी अहंकार का भाव नहीं आना चाहिए। जितना हम विनम्र रहने का प्रयास करेंगे उतना ही हमारी वैशिष्ट्य प्रदर्शित होगी। शास्त्रों में गुरु को महान् माना गया है। यदि गुरु रूष्ट हो जाए तो उसे मनाने का प्रयास व्यक्ति को करना चाहिए। उलाहना देना उनका काम है। हमें उनकी नाराजगी दूर करने का प्रयत्न करने की आवश्यकता है। हमसे जो गल्ती हुई है उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए। इससे समता का विकास होगा। यह उलाहने को झेलने से ही संभव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि पर्युषण के दौरान प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा धर्म की आराधना करने की जरूरत है। यह महापर्व अतीत का प्रतिक्रमण करने का पर्याय है। हमें स्वयं को देखने का प्रयास करना चाहिए। मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि जीवन प्रकृति का नाम है। प्रवृति जन्म से ही प्रारंभ हो जाती है। धार्मिक व्यक्ति को प्रवृति के साथ निवृति का अभ्यास करना चाहिए। उन्होंने अणुव्रत आंदोलन के घोष संयमः खलु जीवनम् का उल्लेख करते हुए कहा कि संयम के जागरण से जीवन सफल हो सकता हे। व्यक्ति को लक्ष्य पूर्वक चलना चाहिए। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
खाद्य संयम दिवस आज
आचार्यश्री के सान्निध्य में शुक्रवार से तेरापंथ समवसरण भिक्षु विहार में पर्युषण पर्व दिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम शुरु होंगे। पहला दिन खाद्य संयम दिवस के रुप में मनाया जाएगा। इस दौरान सुबह सवा पांच बजे से सवा छह बजे तक जप, अर्हत्-वंदना, गुरु वंदना, वृहद् मंगलपाठ, पाथेय, साढे छह बजे से सवा सात बजे तक आसन-प्राणायाम, साढे आठ से नौ बजे तक आगम-वाचन, नौ से ग्यारह बजे तक प्रवचन, सवा ग्यारह बजे से दोपहर बारह बजे तक प्रेक्षाध्यान सिद्धांत प्रयोग, दो से ढाई बजे तक नमस्कार महामंत्र जाप, ढाई से सवा तीन बजे तक व्याख्यान, साढे तीन बजे से चार बजे तक ध्यान, अनुप्रेक्षा, शाम पौने सात बजे से पौने आठ बजे तक गुरु वंदना-प्रतिक्रमण तथा रात आठ बजे से साढे नौ बजे तक अर्हत् वंदना-वक्तव्य होगा।



Wednesday, August 24, 2011

स्वफूर्त बंद रहा केलवा, छात्रों ने निकाली रैली

KELWA RAJSAMAND
गांधीवादी विचारक अन्ना हजारे के आन्दोलन के समर्थन में बुधवार को केलवा कस्बे के बाजार पूरी तरह बंद रहे और विद्यार्थियों ने रैली निकालकर ग्रामीणों के उत्साह में जोश भर दिया। इस दौरान उन्होंने नारेबाजी कर वातावरण को गुंजायमान कर दिया। सत्याग्रह आंदोलन समिति के आहृान पर व्यापारियों ने स्वतः ही अपने प्रतिष्ठान बंद रखते हुए आंदोलन के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।
सुबह से ही बस स्टेण्ड, सूरजपोल, केलवा चौपाटी पर तो हालात यह थे कि चाय-पान की थडिया और सब्जियां बेचने वालों ने भी अपना समर्थन दिया। इससे चाय, गुटके की तलब वाले दिनभर इनके लिए तरस गए। बंद के दौरान पूरे कस्बे में रैली निकाली गई। इसमें शामिल विद्यार्थी व गणमान्य नागरिक तख्तियां लेकर गगनभेदी नारों के स्वर के साथ चल रहे थे। रैली जलमंदिर से प्रारंभ होकर भिक्षु विहार मार्ग से हायर सैकण्डरी स्कूल, पालीवाल मोहल्ला, छतरी चौक, खटीक मोहल्ला, रेगर बस्ती होते हुए पुनः जलमंदिर पहुंची और आमसभा में परिवर्तित हो गई। सभा को डॉ. महेन्द्र कर्णावट, कैलाश जोशी, रेवानाथ मिश्रा, भगवान शर्मा आदि ने संबोधित किया। रैली में पूर्व सरपंच श्यामलाल सांवरिया, राजकुमार पालीवाल, सुरेश सोनी, देवेन्द्र पालीवाल, सुरेश जोशी, मोहनलाल टेलर, दिनेश बोराणा हुक्मीराम साहू आदि उपस्थित थे।


दूसरों पर गलत आरोप लगाना पाप हैः आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि दूसरों पर गलत आरोप लगाना पाप है। दूसरों की निंदा करना, आलोचना करना सरल है, पर स्वयं की पहचान करना कठिन है। व्यक्ति दूसरों के संदर्भ में सत्य जानकारी न करने के बावजूद आरोप लगा देता है यह उचित नहीं है।
आचार्यश्री ने यह उद्गार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान बुधवार को दैनिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने हजारों की संख्या में उपस्थित श्रावक समाज को संबोधित करते हुए कहा कि किसी की गल्ती होती है तो उसे फैलाना अनुचित है। उस गल्ती का अहसास व्यक्ति को करा देना चाहिए, पर असत्य आरोप नहीं लगाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा गतिशील मन है। मन को साधने का अभ्यास होना चाहिए। शरीर यहां बैठा रहता है और अमरीका की यात्रा करके आ जाता है। मन को नियंत्रित करना आ जाता है तो व्यक्ति दूसरों की गलत आलोचना नहीं करेगा और केवल दूसरों को ही नहीं देखेगा, स्वयं की पहचान करने का प्रयास करेगा। मन नियंत्रित होने से क्रिया करते हुए भी साधना कर सकते है। जिस समय जो क्रिया कर रहे है उसी में मन रम जाए तो एकाग्रता साथ रहती है। भावक्रिया हो सकती है।
आचार्यश्री ने व्यस्त जीवन चर्या में बिन समय नियोजित किए धर्म को कैसे अपनाएं पर चर्चा करते हुए कहा कि ईमानदारी, नैतिकता ऐसे सूत्र है जिनकों जीवन में उतारने के लिए अलग समय नहीं लगाना चाहिए। जब व्यापार में, कार्यों में ईमानदारी, नैतिकता होगी तो धर्म की आराधना अपने आप होने लग जाएगी। अणुव्रत यही सिखाता है कि उसको अपनाने के लिए विशेष समय देने की जरुरत नहीं है। आज की अनेक समस्याओं का समाधान इस अणुव्रत से हो सकता है। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री महाप्रज्ञ द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रेक्षाध्यान आत्मिक सुखों को पाने में योगदूत बन सकता है। प्रेक्षाध्यान के प्रयोगों से हम मन, वचन, काया की प्रवृति को संतुलित कर सकते है। अनावश्यक प्रवृति से बचा जा सकता है। अनावश्यक प्रवृति से बचना बहुत बडी साधना है।
इस मौके पर मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि मनुष्य जीवन दुधारी तलवार है। मनुष्य बहुत शक्तिशाली प्राणी है। उसके पास मन, वचन और काया की बहुत बडी शक्ति है। आवश्यकता है कि वह इस शक्ति का उपयोग बंधन को तोडने में करें। इसका उपयोग आत्मा को उज्जवल बनाने में हो। 9 की तपस्या करने वाले सुमित सांखला ने भी इस मौके पर अपने विचार व्यक्त किए। संचालन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
पर्युषण पर्व दिवस कल से
आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में 26 अगस्त से तेरापंथ समवसरण भिक्षु विहार रोड केलवा में पर्युषण पर्व दिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम शुरु होंगे। 26 अगस्त को पहले दिन खाद्य संयम दिवस, 27 अगस्त को स्वाध्याय दिवस, 28 अगस्त को सामायिक दिवस, 29 अगस्त को वाणी संयम दिवस, 30 अगस्त को अणुव्रत चेतना दिवस, 31 अगस्त को जप दिवस, एक सितम्बर को ध्यान दिवस, दो सितम्बर को संवत्सरी महापर्व तथा तीन सितम्बर को क्षमापना दिवस मनाया जाएगा। इस दरम्यान प्रतिदिन सुबह सवा पांच बजे से सवा छह बजे तक जप, अर्हत्-वंदना, गुरु वंदना, वृहद् मंगलपाठ, पाथेय, साढे छह बजे से सवा सात बजे तक आसन-प्राणायाम, साढे आठ से नौ बजे तक आगम-वाचन, नौ से ग्यारह बजे तक प्रवचन, सवा ग्यारह बजे से दोपहर बारह बजे तक प्रेक्षाध्यान सिद्धांत प्रयोग, दो से ढाई बजे तक नमस्कार महामंत्र जाप, ढाई से सवा तीन बजे तक व्याख्यान, साढे तीन बजे से चार बजे तक ध्यान, अनुप्रेक्षा, शाम पौने सात बजे से पौने आठ बजे तक गुरु वंदना-प्रतिक्रमण तथा रात आठ बजे से साढे नौ बजे तक अर्हत् वंदना-वक्तव्य होगा।
सुखी बनों पुस्तक के प्रति बढती जा रही तादाद
आचार्यश्री महाश्रमण की पुस्तक सुखी बनों के प्रति पाठकों की तादाद में निरन्तर वृद्धि जारी हैं। इस पुस्तक के प्रथम दो संस्करण के हाथों हाथ बिक जाने के बाद तीसरा संस्करण विक्रय के लिए यहां उपलब्ध है। पुस्तक के लिए पाठकों की कतार हर समय देखी जा सकती है।


Tuesday, August 23, 2011

दुःख के मूल पर ध्यान केन्द्रित करेंः आचार्यश्री महाश्रमण



आचार्यश्री महाश्रमण ने श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे भौतिक सुखों को त्यागने की प्रवृति विकसित करें। आज उन्हें विभिन्न आसक्तियों ने अपने मोहपाश में बांध लिया है। इससे छुटकारा पाने के लिए धर्म, आराधना, तपस्या की ओर अपना ध्यान आकृष्ट करें। यह हमें परम सुखों की अनुभूति से पीछे की ओर धकेलती है। स्वाध्याय और ध्यान से भी सुख को प्राप्त किया जा सकता है। हमें दुःख के मूल पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मूल तक जाने से ही समाधान मिल सकता है। दुःख को दूर करने के लिए उपाय पर ध्यान दिया जा सकता है।
आचार्यश्री ने यह उद्गार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान मंगलवार को दैनिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मुक्त आत्माओं को जिस प्रकार का सुख मिलता है उस तरह के सुख की अनुभूति किसी व्यक्ति और देवों को भी नहीं होती। व्यक्ति अपनी इंन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेता है तो वह विकास के पथ पर अग्रसर हो जाता है। अगर इंन्द्रियां उसके वश में नहीं रहती है तो वह पतन की ओर चला जाता है। हमारे विचार, आचार और व्यवहार अच्छे होने चाहिए। इससे मन में शुद्धता आएगी और समाज एवं स्वयं का विकास हो सकेगा। आचार्यश्री ने राग और द्वेष को आसक्ति का पर्याय बताते हुए कहा कि आदमी को चाहिए कि वह सुख और दुःख के मूल को समझने का प्रयास करें। अनाशक्ति में वीतरागता में सुख है पर बाहृय पदार्थों में नहीं हो सकता। पदार्थों की आसक्ति दुःख की ओर ले जाती है।
उन्होंने एक मां और बेटे का वृतांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि हम अपने मूल को समझेंगे तो कभी परेशानियों का सामना नहीं करना पडेगा। आदमी को अपनी साधना का मूल्यांकन करना चाहिए। अध्यात्म की साधना करना हमें विशिष्टता का अहसास कराता है। इसे लेकर अपना-अपना दृष्टिकोण हो सकता है। अध्यात्म के आगे चिंतामणि रत्न भी फीका पड जाता है। राग द्वेष की भावना रखना हमें दुख की ओर धकेलता है। इससे दूर रहने के लिए संयम की साधना करने की आवश्यकता है। साधना के विकास की आवश्यकता जताते हुए उन्होंने कहा कि हम मूल लक्ष्यों की प्राप्ति में आगे बढते रहे। हमें यह जानने की जरूरत है कि अनाशक्ति की साधना में अभी क्या स्थिति है।
इसके लिए आत्म परीक्षण कर भीतर व्याप्त कषाय को दूर करना होगा। साथ ही निर्धारित आचार के प्रति जागरूक रहकर इसकी उपेक्षा से बचना होगा। हम अपने जीवन को ऊपरी तौर पर सींचित करेंगे तो मुरझा जाएंगे और मूल से संस्कारों को सीचेंगे तो परिवार और समाज का भी विकास कर सकेंगे।
श्रावक जीवन में आए 12 व्रत
आचार्यश्री ने श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे अपने जीवन में 12 व्रत अपनाने का प्रयास करें। इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। इस जन्म में किए गए व्रत का फल अगले जन्म में मिलता है। ग्रिहस्थ को भी कुछ अंशों में साधना करने की आवश्यकता है। इससे आत्मा का कल्याण हो सकेगा। संबोधि में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि परम् सुख वीतराग को प्राप्त होता है। दिखावे के तौर पर की जाने वाली साधना से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वास्तविक साधना और आध्यात्म की आराधना से हम कषायों को मंद करते है। हमारी इंन्द्रियां शांत रहती है और हमें आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है। उन्होंने अगले माह आने वाले संवत्सरी महापर्व को लेकर कहा कि यह महापर्व हमारे जीवन में वर्षभर के दौरान जाने-अंजाने में होने वाली गल्तियों को सुधारने का दिन है। एक तरह से गं्रथियों को खोलने का अवसर हमें प्राप्त हो रहा है। इस दिन खमत खामना कर अपनी गल्तियों का शोधन करें और अगले वर्ष में अच्छा करने का प्रण लेकर जीवन मार्ग को प्रशस्त करें। जिस तरह से कपडे मैले हो जाते है और हम उन्हें साफ करने के लिए धोते है। उसी तरह से साधना के माध्यम से व्यक्ति को अपनी गल्तियों को धोने की आवश्यकता है। प्रतिक्रमण को भी उन्होंने मन में व्याप्त कषाय का धोने के उपक्रम की संज्ञा दी। उन्होंने शरीर सुख को प्रतिपादित करते हुए कहा कि यह बाहरी तौर पर दिखने वाली अनुभूति है। आत्मिक तौर पर अनुभव किया जाने वाला सुख हमें श्वाश्वत रुप से मिलता है।
अध्यात्म और व्यवहार अलग-अलग
मंत्री मुनि सुमेरमल ने आध्यात्म और व्यवहार को अलग-अलग रुप में प्रतिपादित करते हुए कहा कि अध्यात्म पर चलने वाला व्यक्ति जीवन को बाहर से समेटता है और व्यवहार के मार्ग पर चलने वाला बाहरी दुनियां के चकाचौंध को अपने जीवन में शामिल करने का प्रयास करता है। इस प्रवृति से उसे कुछ समय के लिए सुख की अनुभूति हो सकती है, लेकिन लंबे सुख के लिए हमें बाहर से नजर आने वाली दुनियां के क्रियाकलापों को त्यागने की आवश्यकता है। व्यक्ति अन्य लोगों अथवा दुनियां से उसके सम्मान में की जाने वाली प्रशंसा को सुनकर गदगद हो उठता है और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालने का प्रयास करता है। एक तरह से वह दुनियां की कठपुतली बनकर रह जाता है। इससे सापेक्ष सुख की अनुभूति होती है। हम बाहर की दुनियां में जितना रहेंगे उतना ही अपने जीवन के विकास को अवरुद्ध करेंगे। आध्यात्म बाहरी क्रियाओं को समेटकर भीतर का विकास करता है। स्वयं की अनुभूति के लिए हमें इंद्रियों को शांत रखने की जरूरत है। इससे मन नहीं भटकेगा और परम सुख की अनुभूति होगी। व्यवहार में इतना न रचे कि हम आध्यात्म के सुख को ही भूल जाए। बाहर से हटेंगे तो भीतर देख पाएंगे। उन्होने श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे अपने जीवन को भौतिक सुखों से दूर रखने का प्रयास करें। बोलते समय अपनी वाणी पर संयम रखे। इससे व्यवहार में कमी नहीं बल्कि ओर अधिक प्रगाढता आएगी। इस मौके पर संस्कार सुगंध पत्रिका के अमृत महोत्सव विशेषांक को पत्रिका की संपादिका प्रभा जैन ने आचार्यश्री महाश्रमण को भेंट की। सुमित सांखला को 9 की तपस्या एवं हिनल सांखला को 8 की तपस्या का प्रत्याखान दिया। संचालन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।

Monday, August 22, 2011

राजसमन्द भी अन्ना क्रांति के समर्थन में पूरी तरह कूद पड़ा


राजसमन्द I भ्रष्टाचार का जड़मूल से खात्मा करने के संकल्प के साथ अब राजसमन्द भी अन्ना क्रांति के समर्थन में पूरी तरह कूद पड़ा है। शनिवार को स्वयंसेवी संगठनों ने स्वैच्छिक बंद का आह्वान किया जो सफल रहा हालाकि बाजारों में सोमवार का साप्ताहिक अवकाश होने से अधिकांश दुकानें तो वैसे ही बंद थी लेकिन आम तौर पर सोमवार को अवकाश के दिन भी खुली रहने वाली छोटी मोटी दुकानें भी पूरी तरह बंद रहने से बंद पूर्णतया सफल रहा। शहर ही नहीं आसपास के क्षेत्र में बंद का व्यापक असर देखा गया। इस दौरान भ्रष्टाचार के विरोध एवं अन्ना क्रांति के समर्थन में जिला मुख्यालय पर निकली महारैली में अन्ना समर्थकों का सैलाब उमड़ पड़ा। चहुंओर अन्ना टोपी पहने समर्थक दिखाई दिए और खास बात यह कि ये लोग स्वैच्छा से रैली में पहुंचे और सभी में भ्रष्टाचार के खिलाफ जबर्दस्त आक्रोश था।
जन लोकपाल सत्याग्रह समिति के साथ विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं ने आमजन से अन्ना के आंदोलन को समर्थन करने की अपील की थी। इसके तहत सुबह से ही चाय, पान के केबिन, होटल, रेस्टोरेंट सहित सभी छोटी मोटी दुकानें बंद थी। इस दौरान सुबह करीब 10 बजे राजनगर सर्कल से रैली प्रारम्भ हुई जिसमें शहर के सभी क्षेत्रों के अलावा विभिन्न गांवों से आए लोग शामिल हुए। केलवा क्षेत्र से कई मार्बल खदान मालिक एवं अन्य लोग भी पहुंचे। रैली में सैकड़ों दुपहिया वाहनों पर अन्ना समर्थक सवार थे तो कई ऑटोरिक्शा और अनेक चार पहिया वाहनों पर सवार लोग अपने सर पर अन्ना टोपी पहने हुए थे। कई संगठनों के सैकड़ों पदाधिकारी पीछे की ओर पैदल ही चल रहे थे। अधिकांश समर्थकों के हाथों में तिरंगे लहरा रहे थे तो शेष लोग अपने हाथों में भ्रष्टाचार और केन्द्र सरकार विरोधी नारे लिखी तख्तियां थामे हुए थे। चारों ओर अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है, मैं भी अन्ना तू भी अन्ना-सारा देश है अन्ना, भारत छोड़ो भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार हाय हाय, सोनिया गांधी हाय हाय, मनमोहन हाय हाय आदि के गगनभेदी नारे लगाते हुए अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे थे। रैली मुख्य मार्गो पर होते हुए जलचक्की तिराहा पहुंची जहां दूसरी ओर से पहुंची ग्रामीणों की वाहन रैली से समागम हुआ। आमने सामने से दो रैलियों के समागम के दौरान पूरा जलचक्की तिराहा अन्ना समर्थकों से अट गया और इस दौरान जन सैलाब के कारण अनोखा नजारा पेश हुआ।
जलचक्की पर करीब 15 मिनट तक जमकर नारेबाजी हुई और वंदे मातरम, इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाए गए। यहां से भी बड़ी संख्या में और लोग मुख्य महारैली में शामिल हो गए जबकि मुखर्जी चौराहे की ओर से आई रैली नाथद्वारा रोड़ एवं सौ फिट रोड़ होते हुए आगे निकली। इधर महारैली बस स्टेण्ड और चौपाटी पहुंची और इन दोनों जगहों पर भी जमकर प्रदर्शन किया गया। बाद में जेके मोड़ होकर मुखर्जी चौराहा और फिर वहां से मुख्य मार्ग पर होते हुए निकली। रैली में विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी शामिल थे।


क्षणिक सुखों को त्यागने की आवश्यकताः आचार्यश्री महाश्रमण



आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि मानव जीवन को इंद्रियगत, मनोगत और पदार्थगत के क्षणिक सुखों से विरत् रहकर आत्मिक और शाश्वत सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है। साथ ही अपनी सभाओं-संस्थाओं तथा अपने क्षेत्र में स्थित परिवारों को यह प्रेरणा दें कि अपने कार्यों में इसी आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिए चेष्टारत रहे। उक्त उद्गार आचार्यश्री ने सोमवार को यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान दैनिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने 26 अगस्त से शुरू हो रहे पयुर्षण महापर्व के दौरान श्रावक-श्राविकाओं को धर्माराधना करने की प्रेरणा देते हुए पौषध, उपवास, चारित्रात्माओं के व्याख्यान, अखंड जप आदि को नियमित दैनिक क्रम बनाने की बात कही। उन्होंने समाज में योगक्षेम की प्राप्ति के लिए यह पाथेय दिया कि सभी पदाधिकारी एवं संपूर्ण श्रावक-श्राविका समाज श्रावक संबोध को सीखने और कंठस्थ करने का प्रयास करने की बात कही। साथ ही बारहव्रत को धारण करने का प्रयास करने का आहृान करते हुए उन्होंने अपने परिवार के लोगों में भी विशेषकर युवाओं को प्रेरणा देने की बात कही। आचार्यश्री ने कहा कि तीन दिनों के इस सम्मेलन के दौरान मैंने समय-समय पर जो विचार व्यक्त किए है उन्हें सभी प्रतिनिधिगण ध्यान में रखें और उसके अनुरूप अपनी सभाओं में कार्य करें, तभी हम अपने समाज, परिवार और संघ के योगक्षेम के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह कर पाएंगे। इससे पूर्व मुनि किशनलाल ने महासभा और सभाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा कि महासभा जिस प्रकार पूरी निष्ठा के साथ मां के दायित्व का निर्वहन करती है उसी प्रकार सभाओं का भी यह दायित्व है कि अपनी मां के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करें। महासभा जिस ममत्व और जागरूकता के साथ सभाओं का ध्यान रखती है उनके संवर्धन और विकास के प्रति सजग रहती है। सभाओं में महासभा और केन्द्र के प्रति आभार कृतज्ञता का भाव आवश्यक है। मुनि मोहजीतकुमार ने कहा कि यह सम्मेलन जिन प्रयोजनों से आयोजित किया गया है उसकी उपलब्धि का प्रयास करने की आवश्यकता है। महासभा के अध्यक्ष चैनरुप चिंडालिया ने सम्मेलन का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के महामंत्री भंवरलाल सिंघी ने आभार प्रकट किया।
समाज के आध्यात्मिक उन्नयन की महत्ती आवश्यकता
तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन 2011 का समापन
केलवाः 22 अगस्त
तेरापंथ के 11वें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में सोमवार को तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का समापन हुआ। तीन दिन तक चले सम्मेलन में समाज के आध्यात्मिक उन्नयन के विभिन्न पहलुओं पर गहनता से विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार रात तक चले कार्यक्रम के दौरान जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के महामंत्री भंवरलाल सिंघी ने समाज के विकास के सूत्र और योगक्षेम का प्रवर्तन करते हुए कहा कि जिन संस्थाओं के पास ठोस परियोजनाएं होती है वे दीर्घायु होती है। वे अपनी विकासमान परियोजनाओं के माध्यम से अपने सदस्यों और समाज के लोगों का हितचिंतन करती है।
महासभा के अध्यक्ष चैनरुप चिंडालिया ने महासभा द्वारा संचालित विभिन्न प्रवृतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह समाज को संस्कारित बनाने में मील का पत्थर साबित हो रही है। संस्कारित समाज के बिना किसी तरह की प्रगति कोई मायने नहीं रखती। इसीलिए महासभा ज्ञानशाला के संचालन पर विशेष बल दे रही है। उपासक श्रेणी के विकास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि समाज के आध्यात्मिक उन्नयन की महत्ता को महसूस करते हुए महासभा आचार्यश्री महाश्रमण के दिशा निर्देश में इसके विकास के लिए प्रयासरत है। महासभा के प्रधान न्यासी राजेन्द्र बछावत ने कहा कि महासभा की आर्थिक स्थिति को सुधारने के प्रयास किए जा रहे है। उन्होंने पदाधिकारियों एवं सदस्यों से आग्रह किया कि वे महासभा की सभी गतिविधियों को सुचारू रुप से संचालित करने और भावी योजनाओं की क्रियान्विति में समर्पण भाव से सहयोग करें। महासभा के उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय विसर्जन प्रभारी रतन दुगड ने विसर्जन के मूल उद्देश्य को उद्घाटित किया और कहा कि हमें विसर्जन उपक्रम के माध्यम से समाज के हर परिवार को जोडने का प्रयास करने की आवश्यकता है। मेधावी छात्र प्रोत्साहन परियोजना के संयोजक एवं जैन विश्व भारती के अध्यक्ष सुरेन्द्र चोरडिया ने मेधावी छात्रों को आचार्यश्री तुलसी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ और आचार्यश्री महाश्रमण के नाम से दिए जाने वाले पदकों का उल्लेख करते हुए बताया कि आज तक कुल 154 पदक प्रदान किए जा चुके है। ज्ञानशाला के प्रभारी मुनि उदितकुमार ने कहा कि ज्ञानशाला का प्रभाव अचूक है। इसने आचार्यश्री तुलसी द्वारा देखे गए सपनों को साकार किया है। आज ज्ञानशाला एक मिशन बन गया है। इसका निरन्तर विकास हमारा सामूहिक दायित्व है। मुनिश्री ने कहा कि ज्ञानशाला की प्रशिक्षिका के रूप में हमारे समाज की जिन महिलाओं का योगदान है वे अधिकांशतः गृहणियां है। उन्हें प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। उन्होंने बडी सभाओं का आहृान किया कि वे अपने आस पास के गांवों में ज्ञानशाला के प्रचार प्रसार में सहयोगी बनें। इस अवसर पर जय तुलसी फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी सुरेन्द्र दुगड, ज्ञानशाला के राष्ट्रीय संयोजक सोहनराज चौपडा, प्रदीप चौपडा आदि ने भी विचार प्रकट किए।

Sunday, August 21, 2011

आत्म साधना की पुष्टता आवश्यक-आचार्यश्री महाश्रमण


तेरापंथ के 11वें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि आज के परिवेश में जिस व्यक्ति की आत्म साधना जितनी पुष्ट होगी उतनी ही उसे आनंद की अनुभूति का अहसास होगा। मानव जाति में शांति का भाव बनाए रखने के लिए व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता है। हमें यह प्रयास करना है कि सहज, निरपेक्ष, निर्विकार आनंद का महसूस करें। इसकी प्राप्ति तभी हो सकती है जब हमारा चित्त विशुद्ध हो। हम सभी को अपने दायित्व के प्रति जागरुक और सेवा की भावना प्रबल होनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सदाचार और सत्याचरण से जोडना होगा। उक्त उद्गार आचार्यश्री ने रविवार को यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास में दैनिक प्रवचन के दौरान व्यक्त किए।
उन्होंने साधु-संतों की वाणी को एक पंखें की हवा के माफिक बताते हुए कहा कि जिस तरह से पंखा हवा को चहुंओर फैंकता है और लोगों को राहत प्रदान करता है उसी तरह धर्म की वाणी को जन जन तक पहुंचाने की आवश्यकता हैं, ताकि इसका विकास और विस्तार संभव हो सके। संबोधि के चौथे अध्याय में उल्लेखित भगवान महावीर की बातों को प्रकट करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति में यह भावना होनी अत्यंत आवश्यक है कि वह शांति से अपना जीवन व्यतीत करें। इससे समाज और देश में अशांति की स्थिति कभी उत्पन्न होने की संभावना क्षीण हो जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति को यह चिंतन करना चाहिए कि समाज के विकास में कैसे योगदान कर सकते है। व्यक्ति को अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में हालात को देखते हुए ढालने की आवश्यकता है। अनुकूल हालत में अत्यधिक हर्षित होने की जरुरत नहीं है और प्रतिकूल स्थिति में समता रखने का प्रयास करें। एक साधु को अपने जीवन में जितने आनंद की अनुभूति होती है उतनी देवता को भी नहीं होती।
रक्षक और रोहिणी बनने का प्रयास करें
उन्होंने तेरापंथी महासभा को महत्वपूर्ण संस्था बताते हुए कहा कि महासभा के पदाधिकारी निष्ठावान हो। जीवन अच्छा हो और महासभा को समय दे सकें, तभी यह विकास के पथ पर आगे बढ सकता है। यह स्थिति महासभा के कार्यकाल में पदाधिकारियों के समक्ष नहीं आने चाहिए कि जिस समय उन्होंने गरिमामय पद की बागडोर संभाली और महासभा की स्थिति थी वही बरकरार रहे। उन्हें चाहिए कि वे संख्या को बढाने के साथ ही समाज को संभालने का काम करें। उन्होंने एक सेठ और चार बहुओं का वृतांत प्रस्तुत करते हुए महासभा के पदाधिकारियों से आहृान किया कि वे रक्षक और रोहिणी बनने का प्रयास करें। फंड को बरकरार रखें। इसे घटाने की अपेक्षा इसमें आशातीत वृद्धि का प्रयास करें। निर्वाचित पदाधिकारी यह देखे कि उनके समय में ज्ञानशाला के बच्चों की संख्या, उपासकों की स्थिति पर ध्यान रखें। पदाधिकारियों का यह प्रयास होना चाहिए कि वे स्वयं सामायिक आदि धार्मिक कार्य करते हुए लोगों को उसके लिए प्रेरणा दें।
आचार्यश्री ने तेरापंथ भवन के उपयोग को लेकर कहा कि भवन का कुछ अंश भले ही सामाजिक कार्यों में उपयोग के लिए दिया जाए, किंतु एक स्थान ऐसा अवश्य होना चाहिए जहां उपासना, सामयिक, आसन, प्राणायाम, प्रेक्षाध्यान एवं अन्य धार्मिक कार्य संचालित हो सके। पदाधिकारियों से उन्हांेने कहा कि वे अणुव्रत के काम में सहयोगी बने। एक अणुव्रत प्रकोष्ठ का गठन कर संयोजक की नियुक्ति की जानी चाहिए। उन्होंने संपूर्ण तेरापंथी श्रावक समाज को सुझाव दिया कि वे अपने कार्यों, व्यवहारों से जैनत्व का भाव प्रकट करें और अपने कार्यालयों, प्रतिष्ठानों, दुकानों आदि में भगवान महावीर, आचार्य भिक्षु और तेरापंथ के अन्य आचार्यों के चित्र लगाएं। इस अवसर पर मुनि विजयकुमार, मुनि जयंत कुमार, मुनि प्रशन्नकुमार, मुनि पानमल, मुनि किशनलाल, मुनि सुखलाल आदि ने विचार व्यक्त किए। आचार्यश्री ने अमरीका यात्रा के लिए रवाना हुए समण सिद्धप्रज्ञ को आशीर्वाद प्रदान किया। उदयपुर जिले के कानोड कस्बे के निवासी शिवराज बाबेल की सपत्नीक 30 की तपस्या करने पर प्राख्यान दिया। इनके अनुमोदना में कानोड महिला मंडल की सदस्याओं ने गीत प्रस्तुत किया। संचालन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
छोटा पड गया पांडाल
शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण के मुखवृंद से बहने वाली प्रवचन की रसधारा का श्रवण करने के लिए रविवार को देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों लोगों की भीड उमड पडी। इससे पांडाल छोटा पड गया। अनेक महिला एवं पुरुषों की हालत तो यह थी कि उन्हें बैठने की जगह ही नहीं मिली। ऐसे में उन्हें डेढ घंटे तक खडे रहकर प्रवचन सुनना पडा। यही नहीं आचार्यश्री के दर्शन के लिए लोगांे की लंबी कतार थी।
योगक्षेम निर्वहन विषय पर व्यापक चर्चा
केलवाः 21 अगस्त
जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन के पहले दिन दोपहर बाद से देर रात तक चले सत्र में योगक्षेम निर्वहन विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष चैनरूप चिण्डालिया ने योगक्षेम की परिकल्पना और पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला और तेरापंथ धर्मसंघ के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और मानव कल्याण के क्षेत्र में अब तक हुए विकास को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हम सौभाग्यशाली है कि हमें तेरापंथ धर्मसंघ जैसा महान धर्मसंध प्राप्त हुआ है। क्रांतद्रष्टा आचार्य भिक्षु और परवर्ती आचार्यांे द्वारा प्रदत परंपरा का पालन करते हुए इस धर्मसंघ ने क्रमशः नई ऊंचाई प्राप्त की। गणाधिपति गुरूदेव श्री तुलसी ने शुद्धाचार के पालन और स्वयं तथा दूसरांे के कल्याण के लिए कार्य करने का सूत्र दिया। आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने अहिंसा जीवन विज्ञान जैसे मानव मूल्यों की प्रतिष्ठापना की। आचार्यश्री महाश्रमण के नेतृत्व में तेरापंथ नवोत्थान की ओर प्रस्थित है। उन्होंने योगक्षेम निर्वहन के लिए अनुशासन, संस्कार, निर्माण, सामाजिक पारिवारिक सामजंस्य, समाज के प्रति उत्तरदायित्व, स्वस्थ और सक्षम समाज की संरचना आदि पर जोर डाला।
मुनि कुमारश्रमण ने तेरापंथ धर्मसंघ के अभ्युदय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला और योगक्षेम की प्राप्ति के संदर्भ में कहा कि हम अपने जीवन में उन चीजों का संग्रह करने का प्रयास करते है और सुरक्षित रखते है जो हमारे लिए उपयोगी है। उन चीजों का त्याग करते है जो हमारे लिए हितकर नहीं है। उन्होंने ज्ञानशाला, उपासक श्रेणी, मेधावी छात्र प्रोत्साहन योजना को महत्वपूर्ण बताते हुए ऐसे उपक्रमों के विस्तार की आवश्यकता जताई। जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय की कुलपति समणी चारित्रप्रज्ञा ने योगक्षेम प्रबंधन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। इसके लिए सकारात्मक प्रवृति पर विशेष बल दिया। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल की कोषाध्यक्ष श्रीमती कल्पना बैद ने कहा कि महिलाएं आज घर की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हर क्षेत्र में अपना सक्रिय योगदान देना शुरू कर दिया है। महलाओं को उनका अपेक्षित देय प्राप्त होना चाहिए और उन्हें भी सेवा का उत्तरदायित्व प्रदान करने की पहल होनी चाहिए। तृतीय सत्र में जैन विश्व भारती के अध्यक्ष सुरेन्द्र चोरडिया ने सभा के विकास सूत्र की जानकारी दी। इस अवसर पर जैन श्वैताम्बर तेरापंथी महासभा के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी विजयसिंह चोरडिया, आचार्य महाश्रमण अमृत महोत्सव के संयोजक और महासभा के उपाध्यक्ष ख्यालीलाल तातेड, जैन श्वैताम्बर तेरापंथी महासभा के निवर्तमान अध्यक्ष जसकरण चोपडा आदि ने विचार व्यक्त किए।
अणुव्रत महासमिति कार्यसमिति के पदाधिकारियों की घोषणा
तेरापंथ के 11वें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में रविवार को अध्यक्ष बाबूलाल गोलछा {दिल्ली} ने अणुव्रत महासमिति कार्यसमिति के पदाधिकारियों की घोषणा की। इसमें उपाध्यक्ष कन्हैयालाल गीडिया{ बैंगलौर}, डालचंद कोठारी{ मुंबई}, कमलेश भादानी {तिरिपुर} महामंत्री सम्पत शामसुखा {भीलवाडा}, कोषाध्यक्ष रतनलाल सुराणा {दिल्ली}, संयुक्त मंत्री श्रीमती सुमन नाहटा{दिल्ली}, शिक्षा मंत्री श्रीमती रोजी गोयल{जगराओ}, संगठनमंत्री प्रो. देवेन्द्र जैन { भिवानी}, श्रीमती पुष्पा सिंघी {कटक} तथा अशोकभाई सिंघवी {पसाडा, गांधीधाम} को शामिल किया गया। इसके अलावा संरक्षक में राजसमंद के डा. महेन्द्र कर्णावट, कोयम्बटूर के निर्मल एम रांका तथा जयपुर के जीएल नाहर को मनोनीत किया गया। कार्यसमिति में 20 जनों को आमंत्रित सदस्य तथा 24 जनों को बतौर सदस्य के रुप में शामिल किया गया है।

सभी माइंसें आज रहेगी बंद, नहीं होगा लदान
केलवाः 21 अगस्त
गांधीवादी विचारक अन्ना हजारे की ओर से देशभर में भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे आंदोलन के समर्थन में राजसमंद मार्बल माइन ऑनर्स एसोसिएशन ने सोमवार को सभी माइंसें बंद रखने का निर्णय किया। एसोसिएशन के अध्यक्ष तनसुख बोहरा ने बताया कि बंद के दौरान सभी माइंसों पर डिस्पेच और लदान का कार्य नहीं होगा। सुबह 10 बजे माइंस ऑनर्स राजसमंद जिला मुख्यालय स्थित पुरानी कलक्ट्री एकत्र होंगे, जहां से वे जुलूस के रुप में कलक्टर कार्यालय पहुंचेंगे और उन्हें ज्ञापन सौंपेंगे। बोहरा ने सभी माइंस ऑनर्स से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचे की अपील की।


Saturday, August 20, 2011

नवाल के केलवा पहुंचने पर जोरदार स्वागत

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के अशोक नुवाल ने सेठ रंगलाल कोठारी राजकीय महाविद्यालय में शनिवार को हुए छात्रसंघ के चुनावों में उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के प्रत्याशी को पराजित किया। जीत के बाद नुवाल के अपने पेतृक निवास केलवा पहुंचने पर कार्यकर्ताओं और संगी साथियों ने जोरदार स्वागत किया और आतिशबाजी कर खुशी का इजहार किया। इस दौरान नुवाल का बैण्डबाजों के साथ कस्बे में जुलूस निकाला गया।

नशामुक्त व्यक्ति संस्थाओं के अध्यक्ष न बनेंः आचार्यश्री महाश्रमण



आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि तेरापंथी सभाओं आदि संघीय संरचनाओं के अध्यक्ष आदि पदों पर नशायुक्त व्यक्ति दूर रहना चाहिए। संस्थाओं के पदाधिकारी अनिवार्यत रुप से नशामुक्त हो। यह अपेक्षित है। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता सेवा करता है यह अच्छी बात है। पर सेवा करने की योग्यता अर्जित करनी चाहिए। संस्थाओं के पदों पर आने वाले आवेश पर नियंत्रण रखें, नशा मुक्त हो और चरित्रशुद्धि हो। यह अपेक्षित है। ऐसी अर्हताएं रखने वाला संस्थाओं के साथ जुडकर सेवा करने के योग्य होता है। जिसको सेवा करने का दायित्व मिलता है वह अपने दायित्व के प्रति जागरुक रहे। समाज और संघ में अपना चिंतन नियोजित करें। संगठन संस्था का नेतृत्व कर्ता अपने जीवन को त्याग, संयम और सादगी से स्थापित कर दूसरों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें तो समाज का चहेता बन सकता है और सम्मान पाने की योग्यता पा सकता है।
शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास में शनिवार को दैनिक प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कार्यकर्ता को तीन रुप में परिभाषित करते हुए कहा कि एक कार्यकर्ता वह होता जो केवल काम में विश्वास करता है। इसे मैं उच्च श्रेणी में रखता है। दूसरा काम और नाम दोनों में विश्वास करता है। यह मध्यम श्रेणी में आता है और तीसरा काम तो करता नहीं, बस उसे नाम की चेष्टा रहती है। यह निम्न स्तर का कार्यकर्ता होता है। इसलिए व्यक्ति को सदैव कर्म में विश्वास रखना चाहिए। इससे ही उसकी समाज और देश में अपनी पहचान कायम हो सकेगी। कार्यकर्ता सेवा करें और कभी भी फल की इच्छा मन में न आने दंे। उन्होंने ने संबोधि के चौथे अध्याय में उल्लेखित मुनि मेघ और भगवान महावीर की बातचीत का वृतांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि आनंद चार तरह का होता है। पहला सहजन आनंद, दूसरा निरपेक्ष, तीसरा निरविकारण और चौथा अतिन्द्रिय। चौथे आनंद में इंन्द्रियों से भोगा जाने वाला आनंद नहीं होना चाहिए। भोग से अर्जित किए जाने वाले आनंद की अनुभूति क्षणिकभर की होती है। इसलिए भौतिकता की वस्तुओं को त्यागने की आवश्यकता है। जीवन में आनंद के कई स्त्रोत है। कुछ आनंद पदार्थों और इंन्द्रियों के सेवन से प्राप्त होते है, कुछ आनंद स्वतः ही प्राप्त हो जाते है कुछ विकार सहित होते है और कुछ आनंद अतीन्द्रिय होते है। हमें यह प्रयास करना है कि सहज, निरपेक्ष, निर्विकार और अतीन्द्रिय आनंद का महसूस करें। इसकी प्राप्ति तभी हो सकती है जब हमारा चित्त विशुद्ध हो। तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का आधार विषय योगक्षेम की प्राप्ति है। अतीन्द्रिय और आत्मानंद की प्राप्ति ही सबसे बडा योगक्षेम है। हम सभी को अपने दायित्व के प्रति जागरुक होना चाहिए और हममें सेवा की भावना प्रबल होनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सदाचार और सत्याचरण से जोडना होगा। खान-पान, आचार-व्यवहार, आतम नियंत्रण और दर्शन। इन सबके प्रति जागरुक रहकर कार्य करना होगा। तेरापंथ धर्मसंघ के प्रत्येक व्यक्ति को यह चिंतन करना चाहिए कि समाज के विकास के लिए कैसे योगदान कर सकते है।
जमीकंद का करें त्याग
आचार्यश्री ने श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे अहिंसा के मद्देनजर जमीन से पैदा होने वाली सब्जियों और फलों का परित्याग करें। समय-समय पर होने वाले समाज के भोज के दौरान भी इनके उपयोग से बचने का प्रयास करें। मांगलिक कार्यों के आयोजन के दौरान यदि व्यक्ति इन वस्तुओं के परिहार करने का प्रयास करता है तो उसके जीवन में अहिंसा का भाव सदैव बना रहेगा। यह परिवार और समाज के लिए भी अच्छा साबित हो सकता है। व्यवस्थाओं में उचित परिहार करना आज के परिवेश में महत्ती आवश्यकता बन गया है।
मां के समान है महासभा
उन्होंने तेरापंथ महासभा के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि वह एक मां की तरह कार्य कर रही है जो अपने बच्चों को संरक्षण प्रदान करती है। आचार्यश्री ने पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं से कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को तेरापंथ की आचार संहिता का पालन करना चाहिए। सामायिक, नशामुक्ति, कषायमुक्ति आदि को संघीय प्रवृति का पालन करना चाहिए। तीन दिनों के इस सम्मेलन में खूब चिंतन-मंथन होना चाहिए और कार्यकर्ताओं को अच्छी खुराक मिलनी चाहिए, ताकि वे संघ और समाज के विकास के लिए निर्धारित कार्यक्रमों को लागू करने में पूरी सक्रियता दिखा सकें।
अपने दायित्व के प्रति सचेष्ट हो
मंत्री मुनि सुमेरमल लाडनंू ने तेरापंथी सभा के प्रतिनिधि सम्मेलन को एक विशेष उपलब्धि मानते हुए कहा कि सभी प्रतिनिधि एवं संपर्ण श्रावक समाज आज अपने दायित्व के प्रति सचेष्ट हों और समाजहित में कार्य करें। योगक्षेम अपने आप में एक महत्वपूर्ण विषय है। इसकी उपलब्धि वात्सल्य और परस्पर हित चिंतन से ही संभव है। योगक्षेम का निर्वाह धार्मिक और व्यावहारिक कल्याण की रक्षा के द्वारा ही हो सकता है। तेरापंथ धर्मसंघ से जुडी संस्थाएं यह प्रयास करें कि समाज में शिक्षा का विकास हो। कोई भी छात्र अर्थ के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे। तभी हमारे धर्मसंघ की नींव मजबूत होगी।
परपंराओं से नई पीढी को अवगत कराएं
साध्वी प्रमुख कनकप्रभा ने कहा कि तेरापंथ का ध्वज तेरापंथ के आधार का प्रतीक है। उसमें जुडे हुए दोनों हाथ भगवान महावीर के प्रति नमन और तेरापंथ के प्रति आस्था और विश्वास दर्शाते है। आज संपूर्ण जैन समाज तेरापंथ का आशाभरी नजरों से देख रहा है। आज हम विचार करें कि हम किस स्तर तक पहुंचे है और कहां पहुंचना है। हम अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य का निर्माण करें। योगक्षेम शब्द पर चर्चा करते हुए साध्वी प्रमुखा ने कहा कि यह तेरापंथ के लिए बहुत परिचित शब्द है जिसका प्रयोग आचार्यश्री तुलसी ने संघ विकास के लिए किया था। हमें विचार करना है कि संघीय आस्था को और अधिक कैसे मजबूत कर सकते है। योगक्षेम की प्राप्ति के लिए यह जरुरी है कि हम आत्म चिंतन करें। यदि बदलाव की जरूरत है तो उस पर भी विचार करें। क्योंकि युगीन बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तेरापंथ का 250 वर्षों का इतिहास स्वयं इसका प्रमाण है। इसमें समय-समय पर परिवर्तन हुए हैं। आचार्यों ने समय की नब्ज को पहचानते हुए युगीन परिवर्तन किए। आज का युग बौद्धिक और वैज्ञानिक युग है। समाज के विकास के लिए धर्म और अध्यात्म के साथ ही जीवन की वास्तविकताओं का ध्यान रखना आवश्यक है। समय गतिशील है हम उसके साथ गतिमान होकर आगे बढे तो सफलता प्राप्त कर सकते है। साध्वी प्रमुखा ने कहा कि योगक्षेम की उपलब्धि के लिए हमें चार बातों पर विचार करना है। सबसे पहले यह कि हमें जो अब तक प्राप्त नहीं है उसके लिए प्रयास करना है। जो प्राप्त है उसकी सुरक्षा करनी है। जो प्राप्त हो चुका है उसी से आत्म संतुष्ट नहीं होना है। उसे भावी विकास के लिए विनियोजित करना है।
महासभा के प्रभारी मुनि धजंयकुमार ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ की शीर्षस्थ संस्था होने का गौरव प्राप्त है। वह अनेक परियोजनाओं का आयोजन कर संघ और समाज के विकास के लिए कार्य करती है। इस प्रतिनिधि सम्मेलन में योगक्षेम प्राप्ति के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार विमर्श किया जाएगा। तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष चैनरूप चिंडालिया ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि योगक्षेम की पावना भावना से अणुपा्रणित यह तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन अपनी कई विशिष्टताओं के लिए इतिहास स्वर्णिम पृष्ठ बनेगा। सम्मेलन का केन्द्रीय विषय योगक्षेम है, जो वर्तमान में हमारे संघ, समाज के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रसंग है। मेवाड कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश बसंती लाल बाबेल ने आचार्यश्री महाश्रमण के प्रज्ञावान व्यक्तित्व और अमृत धारा प्रवाहिनी की अभिवंदना की। तेरापंथी महासभा के महामंत्री भंवरलाल सिंघी ने सभा प्रतिनिधि सम्मेलन की प्रस्तावना प्रस्तुत की। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष चिंडालिया ने तेरापंथ का ध्वजारोहण और सम्मेलन के सूत्र वाक्य योगक्षेमं प्राप्स्याम के प्रतीक चिन्ह का अनवारण किया। चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी ने स्वागत की रस्म अदा की। महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी ने आभार जताया। तीन दिन तक चलने वाले प्रतिनिधि सम्मेलन में देशव्यापी सभाओं के लगभग 650 से अधिक प्रतिभागी शिरकत कर रहे है। कार्यक्रम का प्रारंभ आचार्यश्री की ओर से पेश मंगलपाठ से हुआ।