Saturday, July 23, 2011

आचार्य महाश्रमण की सादगी से प्रभावित हंूः डॉ. कलाम

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम ने भिक्षु विहार में अध्यात्म और विज्ञान पर आयोजित संगोष्ठी में कहा कि मैं आज अलौकिक वातावरण में उपस्थित हुआ हंू। आचार्य महाश्रमण एवं उनके साधु-साध्वियां अध्यात्म के शिखर को छू रहे है। आचार्य की सादगी, सरलता ने बहुत प्रभावित किया है। मेरा आचार्य महाप्रज्ञ के साथ एकत्व भाव था। आज महाश्रमण से भी

एकत्व भाव होकर आल्हादित हंू। डॉ कलाम ने कहा कि विज्ञान पदार्थ के बारे में चर्चा करता हंू और अध्यात्म क्षमता के विकास और योजना पर कार्य करता हंू। दोनों के चिन्तन की एकता, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा। मैं प्रबुद्ध संतों के बीच हंू। आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में हंू। इनमें मानवता के प्रति करुणा कूट-कूट कर भरी हुई हैं। इनके साथ अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की बात देश को नई दिशा देगी। डॉ. कलाम ने आचार्य महाप्रज्ञ का स्मरण करते हुए कहा कि उनके इस संदर्भ में अनके बार चर्चाएं हुई। उनका एक वाक्य मुझे हमेशा याद रहता है। उसमें उन्होंने कहा है कि आत्मा ही मेरा भगवान हैैं, तपस्या मेरी प्रार्थना है, मैत्री ही मेरा समर्पण है, संयम मेरी ताकत है और अहिंसा मेरा धर्म है। डा. कलाम ने कहा कि लोग युद्ध से, हिंसा से दूर रहे। यह अध्यात्म से संभव है। जब अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय होगा, तभी विश्व में शांति, समृद्धि और विकास स्थापित होगा।

महाप्रज्ञ के निर्देश पालन कर रहा हंू

मिसाइलमैन ने कहा कि जब मैं पहली बार दिल्ली में आचार्य महाप्रज्ञ से मिला था, तब उन्होंने मुझे शांति की मिसाइल बनाने की कमान सौंपी थी। इतने वर्षों में मैं इस पर शोध कर रहा हंू। आज अणु बम अमेरिका एवं रुस के पास ज्यादा है। अन्य देशों के पास 10 प्रतिशत है। आणविक ऊर्जा को निष्प्रभावी बनाने पर कार्य चल रहा हैं। पर आज अणु बम से ज्यादा खतरनाक साईबर आतंक हो रहा है। अणु बम एक साथ मनुष्यों को खत्म कर सकता है, पर यह आतंक व्यक्ति के विचारों को प्रमाणित करता है। इसके प्रभाव में आने वाले पांच व्यक्ति पचास को प्रभावित करते है इससे बचाव का उपाय खोजना जरुरी है। मैं इसको ध्यान में रखकर आचार्य महाप्रज्ञ के निर्देश पर कार्य कर रहा हंू।

मेरे तीन गुरु

मिसाइलमैन डॉ. कलाम ने कहा कि मैं तीन लोगों से प्रभावित हंू। भगवान महावीर, महात्मा गांधी और आचार्य महाप्रज्ञ। ये तीनों मेरे गुरु है। इनसे मैंने जीने की दृष्टि पाई है। इनका चिंतन मुझे राह दिखाता रहता है।

विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरकः आचार्य महाश्रमण

आचार्य महाश्रमण ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक है। विज्ञान के बिना आध्यात्म अधूरा है तो आध्यात्म के बिना विज्ञान भी पूर्ण नहीं हैं। अध्यात्म परम लक्ष्य मोक्ष है वहीं विज्ञान केवल पदार्थों तक सीमित हैं। आध्यात्म जहां अन्य शक्ति का संदेश देता है वही विज्ञान पदार्थों के प्रति आकर्षण बढा रहा है। दोनों के समन्वय होने पर ही समान विकास की राह खुल सकती है और पावरफूल राष्ट्र का निर्माण हो सकता हैं।

संगोष्ठी में अणुविभा के सोहन लाल गांधी एवं व्यवस्था समिति के महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी ने विचार व्यक्त किए। व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, संयुक्त मंत्री मूलचंद मेहता, स्वागताध्यक्ष परमेश्वर बोहरा, तेरापंथ सभा अध्यक्ष बाबू लाल कोठारी, मंत्री लवेश मादरेचा, महेन्द्र कोठारी अपेक्ष, प्रकाश चपलोत, राजकुमार कोठारी, राजेन्द्र कोठारी, भगवती लाल बोहरा, तेयुप अध्यक्ष विकास कोठारी, मंत्री लक्की कोठारी, महिला मंडल अध्यक्षा श्रीमती फूली देवी बोहरा, मंत्री रत्ना कोठारी, किरण कोठारी ने डॉ कलाम का परपंरागत स्वागत किया। तेजकरण सुराणा ने संचालन किया।

Friday, July 22, 2011

अतिकामना समाज के लिए घातकः आचार्य महाश्रमण

आचार्य महाश्रमण ने संबोधि के तीसरे अध्याय में ज्ञान को लेकर बताए गए पांच बिन्दुओं की व्याख्या करते हुए श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे ज्ञान अर्जित करते समय दूसरे की सहायता की आकांक्षा नहीं रखें। इस तरह की प्रवृति से इंन्द्रियों पर स्वयं का नियंत्रण नहीं रहता और प्रत्यक्ष की बजाय हम केवल परोक्ष ज्ञान तक ही सीमित होेकर रह जाते हैं। यह उद्गार उन्होंने शुक्रवार को भिक्षुविहार में दैनिक प्रवचन के दौरान व्यकत किए।

उन्होंने अवधिज्ञान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति समस्त कामनाओं से विरक्त हो जाता है और ध्यान-साधना की तरफ झुक जाता है। उसे इस तरह के ज्ञान की अनुभूति होती हैं। इस तरह की स्थिति आचार्य भिक्षु के जीवन के अंतिम समय में रही। उन्हें विशेष ज्ञान हुआ, जिसे आचार्य तुलसी ने अवधिज्ञान माना। इसलिए मनुष्य में ज्ञान भले ही न हो, लेकिन साधना के प्रति सदैव सचेत रहे। ज्ञान का विकास करे और विकारों को अपने आस पास नहीं आने दें। माया-मोह को मंद करे तो साधना व ज्ञान का विकास स्वतः ही हो जाएगा।

अतिकामना के परिणाम समाज के लिए घातक

उन्होंने कहा कि अतिकामना के परिणाम समाज के लिए घातक होते है। इससे पाप, अपराध और व्यसन में वृद्धि होती हैैं और ईमानदारी लुप्त हो जाती है। मन में हिंसा का प्रादुर्भाव हो जाता हैं। उन्होंने ईमानदारी के संदर्भ में चन्द्रगुप्त का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि जिस राष्ट्रª का प्रधानमंत्री ईमानदार, उज्जवल भविष्य वाला होता है तो उसकी जनता भी ईमानदारी पर विष्वास करती हैं। उन्होंने कहा कि मानव जाति मौत, कष्ट, वेदना और अवमामना से बहुत डरती है। यह हमारी दुर्बलता का परिचायक है। इस संदर्भ में मात्र सोचकर ही हम भयभीत हो जाते है। यह भय निरन्तर साधना और ध्यान करने से ही दूर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आदमी चार कारणों से झूठ बोलता है। इससे उपकृत होने का सभी को प्रयास करना चाहिए। मोहकर्म का प्रभाव हमेशा बना रहे और इसी के आधार पर साधना चलनी चाहिए। इससे ज्ञान का विकास व बुद्धि का सम्मान होगा। जिसमें ज्ञान-ध्यान का समावेश नहीं होता वह व्यक्ति इस मायने में ष्वान की श्रेणी में आ जाता हैं। उन्होंने शिविरार्थियों और विद्यार्थियों को ज्ञान अर्जित करने की सीख देते हुए आहृान किया कि वे धर्म और साधना के प्रति गंभीर रहे।

स्याह में ढंूढे जीवन का प्रकाश

मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि व्यक्ति जितनी धर्म में प्रवृति करता है वह निवृति के लिए होती है। सभी धार्मिक दर्शनों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पूरी उपासना और ज्ञानार्जन के बाद आत्मा की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। व्यक्ति इसे तत्काल प्राप्त करने के लिए बाहरी परिप्रेक्ष्य में भटकता है, लेकिन उसे सभी ओर से असफलता मिलती है। उन्होंने कहा कि ज्ञान, ध्यान और अपेक्षानुसार तपस्या का भाव हो तो उस व्यक्ति को इसकी अनुभूति होती है। आदमी आंखे मंूदकर अनुभूति की चाह रखता है। प्रारंभ में अंधेरा दिखता है, लेकिन स्याह में उसे मार्ग को ढंूढने की जरुरत है। ज्यों-ज्यों ज्ञान मिलता जाएगा उसका जीवन प्रकाशमय हो जाएगा। उन्होंने महिला और पुरुषों को तत्व ज्ञान के विकास, जिज्ञासाएं बढाने और स्वयं का मार्ग ढंूढने का आहृान किया। गुजरात से आए वीबी चौहान ने कहा कि हमारी देह स्वस्थ है तो साधना पूरी की जा सकती हे। इसके लिए हमें मन को नियंत्रित करने की आवष्यकता हैं। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।

Wednesday, July 20, 2011

त्यागी मनुष्य को नमन करते हैं देवताः आचार्य महाश्रमण

आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जिस व्यक्ति में धर्मयुक्त और त्याग की भावना का समावेश होता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। धर्म की बजाय भौतिकता व कुछ पाने की लालसा का भाव जिसके मन में विद्यमान हो तो उसके आस-पास देवता भी नहीं आते। आचार्य बुधवार को केलवा में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम में श्रावक-श्राविकाओं के सम्मुख दैनिक प्रवचन दे रहे थे।

आचार्य ने संबोधि के तीसरे अध्याय में उल्लेखित चार गतियों का वर्णन करते हुए कहा कि अच्छा जीव तभी जी सकता है, जब वह बाहरी गतियों को दमन करें। देवता मनुष्यों के पास भी आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए आवष्यक है कि वह धर्मयुक्त हो। जो साधक अल्प मात्रा में आहार ग्रहण करने, निद्रा पर संयम रखने और कम बोलने की क्षमता रखता हैं उसे भी देवता नमस्कार करते हैं और समय-समय पर धरती पर आते हैं। उन्होंने देवताओं के धरती पर आगमन के चार कारणों की व्याख्या करते हुए कहा कि देवता आमतौर पर मुमुक्षु आत्मा के दर्शन, तपस्वियों के दर्शन, कुटुम्बियों से मिलने और अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए साक्षात् भी दर्शन दे सकते हैं। यह प्रत्यक्ष रुप से कम वरन् अप्रत्यक्ष रुप से ज्यादा आसपास रहते हैं।

उन्होंने देवताओं के आगमन के लक्षण पर कहा कि इनका प्रतिबिम्ब कभी भी धरती पर प्रकट नहीं होता। इनके पांव हमेशा धरती से ऊंचे और अनिमेश की स्थिति बनी रहती हैं।

संबोधि में उल्लेख है कि रुखा-सूखा खाकर एकांत में निवास करने और इंद्रियों का दमन करने वाले साधक के समक्ष देवताओं का आगमन होता हैं। इन्हें लेकर मनुष्य को कभी आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, बल्कि धर्म-साधना में इतने तल्लीन हो जाना चाहिए कि देवता स्वतः ही उनके समक्ष किसी भी रुप में प्रकट हो जाए। उन्होंने देवताओं और मनुष्यों में समानता पर कहा कि दोनों के ही पांच इंद्रियां होती हैं। साथ ही कुछ असमानता भी होती है, जो नजर नहीं आती। इसे लेकर उन्होंने देवताओं के प्रकट होने का तथ्य भी प्रस्तुत किया। साथ ही कहा कि जिस साधक अथवा साधु में क्रोध और ’मैं’ की भावना आ जाती है तो वह अपनी साधना को कमजोर कर लेता हैं। इसलिए मन में कभी अपनी विशिष्टता का अहंकार नहीं लाएं। उन्होंने इस संबंध में धोबी और साधु के प्रसंग का वृतांत भी प्रस्तुत किया। साथ ही कहा कि संसार में देवताओं की अपेक्षा मनुष्यों की तादात् काफी कम हैैं। देवता समंदर है तो मनुष्य बंूद मात्र है। उन्होंने देश और प्रदेशभर के विभिन्न प्रांतों से आए श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे भौतिक लालसाओं के प्रति मोह त्यागकर अपने जीवन का कुछ समय धर्म और साधना को समर्पित करें। इससे न केवल उनका वरन् परिवार के अन्य सदस्यों का भी कल्याण होगा।

अच्छे कर्मों पर कायम रखें विष्वास

मंत्री मुनि सुमेरमल ने कर्मों के फल की व्याख्या करते हुए कहा कि आहृान किया कि मनुष्य को हमेशा अपने अच्छे कर्मों पर विष्वास करना होगा, ताकि कोई विकार उसके उद्देष्यों का डगमगा नहीं सके। हमें विकार को रोककर विकास की तरफ निरन्तर बढना होगा। क्यों कि जहां विकास होता है वहां विकार की संभावना ज्यादा बढ जाती है। इसके लिए जागरुक रहने की महत्ती आवष्यकता हैं। जो कर्म आसक्ति से परिपूर्ण होते है, इससे छुटकारा पाने के लिए अतिरिक्त पुरुषार्थ करना पडता है। मन को भीतर से जागरुक बनाना होगा। उन्होंने सम्यक भाव से धार्मिक कार्यों की क्रियान्विति करने का आहृान करते हुए कहा कि ऐसा करने से जीवन में सफलता मिलने की संभावना बढ जाएगी।

कार्यक्रम के दौरान कन्या मण्डल बोरज की बालिकाओं कुसुम और चंदा ने ‘ भिक्षुस्वामी संग तुम्हारा, सारे जहां से न्यारा, है यह सबको प्यारा, तुमने संवारा, तुमने निखारा गीत प्रस्तुत कर भाव विभोर कर दिया। संयोजन मुनि मोहजीत कमार ने किया।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम 23 को केलवा में

पूर्व राष्ट्रपति और महान् वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 23 जुलाई को केलवा कस्बे में आएंगे।

चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी ने बताया कि डॉ कलाम षनिवार को कस्बे के भिक्षु विहार में आयोजित अध्यात्म एवं विज्ञान विषयक चिंतन गोष्ठी में व्याख्यान देंगे। इस दौरान अध्यात्म व विज्ञान के षिखर पुरुष अणुव्रत अनुषास्ता आचार्य महाश्रमण का विषिष्ट आतिथ्य प्राप्त होगा। कोठारी ने बताया कि दोपहर दो बजे प्रस्तावित इस गोष्ठी में केवल साधु, साध्वी एवं समणी वृन्द की सहभागिता रहेगी।

आचार्य महाश्रमण से मिले पर्यावरण विकास संस्था के पदाधिकारी

केलवाः

कस्बे के भिक्षु विहार में चातुर्मास के लिए विराजमान आचार्य महाश्रमण से पर्यावरण विकास संस्था के अध्यक्ष हरिसिंह राठौड की अगुवाई में पदाधिकारियों ने भेंट की और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न उपायों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अन्तर्गत एक सेमीनार आयोजित करने के साथ ही 60 हजार पौधे लगाने पर चर्चा की गई। इस अवसर पर अध्यक्ष राठौड के अलावा सचिव उमेष झा, चातुर्मास विकास समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, बाबूलाल कोठारी, महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी, लवेष मादरेचा आदि उपस्थित थे।

Tuesday, July 19, 2011

छात्र की पिटाई से छाया ग्रामीणों में रोष

- अभिभावकों ने मंगलवार को बच्चों को नहीं भेजा स्कूल- ग्रामीणों ने रखी अध्यापक के स्थानान्तरण की मांगराजसमंद। लावासरदारगढ उपतहसील के अपने ननिहाल कलामतों का खेडा स्कूल में अध्ययनरत छात्र की अघ्यापक द्वारा पिटाई से सहमें व ज्वर रोग से पीडित हुए छात्र के नाना ने जिला पुलिस अधीक्षक राजसमंद से मिल कर दोषी अध्यापक के विरुद्व कार्यवाही करने एवं ग्रामीणों ने अध्यापक को हटाने की मांग प्रशासन से की है।प्राप्त जानकारी के अनुसार कलामतों का खेडा निवासी भीमराज गाडरी ने जिला पुलिस अधीक्षक को सोमवार को परिवाद देते हुए बताया कि उसका दोहिता उदयलाल पुत्र जोधराज गाडरी राजकीय प्राथमिक विद्यालय कलामतों का खेडा के कक्षा चार में पढता हैं। उदयलाल हमेशा की तरह शनिवार को भी स्कूल गया जहां अध्यापक रतनलाल रेगर ने उसके दौहितें उदयलाल की बन्द कमरें में बेवजह पिटाई कर दी; जिसके चलते उदयलाल घर आकर बीमार हो गया। बुखार से पीडित छात्र उदयलाल गाडरी की पिटाई को लेकर पूरे गांव में अध्यापक के प्रति आक्रोष व्याप्त हो गया। तथा ग्रामीण अध्यापक के स्थानान्तरण को लेकर मंगलवार को स्कूल के बाहर जमा हो गयें तथा इस दौरान बच्चों को भी स्कूल नहीं भेजा।बच्चें स्कूल के बाहर खेलते रहें- मंगलवार को अध्यापक के विरुद्व उपजे असंतोष को लेकर ग्रामीण स्कूल के बाहर जमा हो गये तथा जब तक अध्यापक को हटाया नहीं जाता जब तक बच्चों को स्कूल नहीं भेजने पर अडे रहें। जबकि छात्र इस दौरान स्कूल के बाहर खेलने में मस्त नजर आयें।नायबतहसीलदार ने की समझाईस की कोशिश- मौके पर बिगडें माहौल को देखकर नायब तहसीलदार प्रभुलाल जैन तथा पुलिस पहुचीं और इस दौरान ग्रामीणों से समझाईस कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कहा गया पर ग्रामीण अध्यापक के ट्रांसफर कराने की मांग पर अडे रहै और स्कूल समय तक अभिभावको ने बच्चों को स्कूल नहीं भेजें। इस अवसर पर नोडल अधिकारी अम्बालाल सालवी भी मौजूद थें। ग्रामीणों ने सौंपा ज्ञापन- मौके पर पहुचें नायब तहसीलदार प्रभुलाल जैन को कलामतो का खेडा निवासी छीतरमल जाट; किशनलाल; नाथ्ूलाल सेन; पारसमल गाडरी; चेना गाडरी; मोहन भील; अम्बालाल; भेंरुलाल ; भंवरलाल सहित करीब दो दर्जन ग्रामीणों ने ज्ञापन सौंपते हुए बताया कि अघ्यापक को तुरन्त प्रभाव से हटाया जायें। अध्यापक के यहां से जाने के बाद हीं बच्चों को स्कूल भेजने की बात कहीं।नही ंतो सभी टीसी कटायेंगें- अभिभावको ने कहा कि अगर अध्यापक को शीघ्र हीं नही हटाया गया तो स्कूल में अध्ययनरत सभी 79 छात्रों की टीसी कटवायें जाने के लिए मजबूर होना पडेगा।

इनका कहना है

” पूरी तन्मयता ;निष्ठा व ईमानदारी के साथ मैं इस विद्यालय में विगत 12 वर्षों से अपनी सेवायें देता रहा हू। ईमानदारी का ग्रामीणों ने मुझे इस तरह का प्रतिफल दिया है। मुझे इसका मलाल जरुर हैं । मैंनें छात्र के साथ कोई पिटाई नहीं की हैं। कुछ स्वार्थी लोग ऐसा माहौल बना रहें हैं। रतनलाल रेगर; अध्यापक राप्रावि कलामतो का खेडा”


ग्रामीणों की अध्यापक रतनलाल रेगर के विरुद्व शिकायत मिली हैं। नोडल अधिकारी से रिपोर्ट मांगी हैं। रिपोर्ट मिलतें ही उचित कार्यवाही की जायेगी।सत्यदेव शर्मा; ब्लाक शिक्षा अधिकारी आमेट

निर्मलता के बिना मोक्ष का मार्ग आसान नहींः आचार्य महाश्रमण

केलवा में चातुर्मास कार्यक्रम, सोमवार रात को आयोजित हुई कार्यशालाबुधवार को होगी उपासना प्रशिक्षण शिविर के लिए प्रवेश परीक्षा
मन में निर्मल चेतना का भाव और आज के भौतिकतावादी परिवेश से परिपूर्ण जीवन को त्यागने की क्षमता मनुष्य में हो तो उसे मोक्ष मार्ग की प्राप्ति अवष्य होती है। एकाग्रचित्त होकर की गई साधना से भी मोक्ष मार्ग के द्वार स्वतः ही खुल जाते है। यह उद्गार आचार्य महाश्रमण ने मंगलवार को केलवा में भिक्षु विहार में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम में व्यक्त किए। उन्हांेने संबोधि के तीसरे अध्याय में उल्लेखित निर्मल चेतना के संदर्भ में कहा कि जिस मनुष्यके चित्त में निर्मल का भाव नहीं हैं और जो वर्तमान जीवन के भौतिकता से भरे जीवन के सुख को छोड नहीं सकता। उसे मोक्ष मार्ग की प्राप्ति नहीं होती। इसके लिए मनुष्य को माया- मोह के परित्याग के साथ सांसारिक दलदल दूर रहकर निर्मल भाव से ध्यान आराधना करनी होगी तभी उसका मानव जीवन सार्थक हो सकेगा। आचार्य ने जाति स्मृति ज्ञान की व्याख्या करते हुए कहा कि संधि अवस्था में होने वाला ज्ञान पिछले जन्म के दौरान किए गए रचनात्मक कार्यांे से मिल सकता हैं। जाति के तीन कारणों के संदर्भ में उन्हांेने कहा कि तीर्थंकर के माध्यम से प्राप्त होने वाली जानकारी से पूर्व जन्म में किए गए कार्यों और धर्म का ज्ञान हो सकता हैं। यही नहीं तीर्थंकर की बातों को सुनकर आए किसी अन्य व्यक्ति की बातों से भी इस तरह का ज्ञान मिल सकता हैं। उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से अपने परिवार को स्वर्ग बनाने का आग्रह करते हुए कहा कि मनुष्य में किसी प्रकार का ज्ञान हो अथवा ना हो, लेकिन उसे साधना अवष्य करनी चाहिए। परिवार स्वर्ग तभी बन सकता हैं जब पति-पत्नी, भाई-भाई, पिता-पुत्र में किसी तरह का राग द्वेष न हो। उनमें संपत्ति इत्यादि को लेकर किसी तरह खींचतान का भाव ना हो, क्यों कि इस तरह के भाव जीवन में आने से घर का वातावरण स्वर्ग की बजाय नरक बन जाता है। दो भाईयों के बीच संपत्ति को लेकर छिडे विवाद का उदाहरण देते हुए उन्हांेने कहा कि कोई भी परिवार स्वर्ग की राह पर तभी चल सकता है जब सदस्यों में कटुता के भाव का समावेश न हो। परिवार में संस्कार अच्छे होना आवष्यक है। इसके बिना अच्छे परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती। संस्कारित जीवन के अभाव में कलह, विपत्ति, नशाखोरी और परस्पर झगडे की नौबत हमेशा बनी रहेगी। आचार्य ने पांडाल में मौजूद श्रावक-श्राविकाओं से आग्रह किया कि वे परिवार की सुख शांति के लिए भौतिक लालसाओं का परित्याग कर जीवन का कुछ समय उपासना में लगाएं, क्योंकि धार्मिकता के साथ साधना भी आवष्यक हैं। स्वर्ग सुख और शांति का प्रतीक हैं। मोक्ष में जाना बडी बात है। इसके लिए वर्तमान को न देखें, बल्कि यह देखें कि साधना निर्मल है या नहीं। व्यवहार में लाएं मधुरतामंत्री मुनि सुमेरमल ने श्रावक-श्राविकाओं से अपने रोजमर्रा के जीवन में मधुरता लाने का आग्रह करते हुए कहा कि मनुष्य की पहचान उसके कार्यों, बोलचाल, रहन-सहन से होती है। ऐसे में यदि वह असभ्य बातों का उच्चारण अपने जीवन में करेगा तो उसका असर परिवार के साथ समाज पर भी पडेगा। इससे बचने के लिए वे अपने घर का वातावरण धर्ममय बनाने की दिशा में पहल करे। दैनिक जीवन में धार्मिक क्रिया की पहल की जाए तो देवता भी उस घर में निवास करते हैं। कलह से भरे वातावरण में देवता भी आने से कतराते हैं। इसलिए चिन्तन करने की महत्ती आवष्यकता है क्यों कि धर्म देखने की नहीं वरन् जीने की वस्तु हैं। उन्होंने हिंसा को अनावष्यक बताते हुए लोगों को इससे सदा परे रहने का आग्रह किया। उपासक प्रशिक्षण शिविर बुधवार से मुनि योगेश कुमार ने कार्यक्रम के दौरान बुधवार से शुरु हो रहे उपासक प्रशिक्षण शिविर की जानकारी दी। उन्हांेने बताया कि इस शिविर में शामिल होने से पूर्व दोपहर एक बजे प्रवेश परीक्षा होगी। इसमें 70 फीसदी अंक प्राप्त करने वाले संभागी दस दिन तक चलने वाले शिविर में शिरकत कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि वर्तमान में 270 उपासक जुडे हुए है और देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा कर चुके है। अंत में मंगलगान हुआ। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया। जैन विद्या कार्यशाला का आयोजनइससे पूर्व सोमवार रात को तेरापंथ युवक परिषद् की ओर से आयोजित जैन विद्या कार्यशाला में जैन धर्म महान क्यों ? विषय पर चर्चा की गई। इस दौरान आचार्य महाश्रमण ने कहा कि राग, द्वेष, विजेता, अनंतज्ञान से संपन्न साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका इन चार तीर्थों की स्थापना करने वाले तीर्थंकर जिन कहलाते हैं। उन्होंने आज के युग को बुद्धि और तर्क की संज्ञा देते हुए आचार्य तुलसी के ष्लोक के माध्यम से जैनधर्म की महानता को परिभाषित किया। साथ ही सात मानकों पर विस्तार से चर्चा की। कार्यशाला के प्रशिक्षक मुनि दिनेश कुमार ने आयोजन की उपादेयता और आज के परिवेश में इसकी आवष्यकता पर प्रकाश डाला। रात साढे नौ बजे तक चली कार्यशाला में व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी व तेरापंथ यु.प.के अध्यक्ष विकास कोठारी ने आचार्य महाश्रमण को कीट भेट किया। इस दौरान तेरापंथ यु.प.के मंत्री लक्की कोठारी सहित सदस्य मौजूद थे।