
डॉ. कलाम को अध्यक्ष कोठारी, उनकी पत्नी स्नेहलता कोठारी, तेरापंथी समाज के अध्यक्ष बाबू लाल कोठारी, तेयुप के अध्यक्ष विकास कोठारी, अशोक जैन, अरविंद कावडिया सहित युवा परिषद के अनेक पदाधिकारियों ने आचार्य महाप्रज्ञ की तस्वीर भेंट की।
सपने देखने वाले ही आगे बढ़ते हैं क्योंकि सपनों से विचार बनते हैं, विचार से क्रिया का जन्म होता है। क्रिया से व्यवहार बनता है और व्यवहार ही इंसान की पहचान है। जैसा इंसान होगा, वैसा ही समाज एवं राष्ट्र का निर्माण होगा। ऐसा ही सपना अणुविभा के संस्थापक मोहनभाई ने साकार किया है जो ’षिक्षा व नैतिक मूल्यों के समन्वय की जीवन्त प्रयोगषाला है’ ।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अणुव्रत विष्व भारती में आयोजित ’वर्तमान षिक्षा पद्धति और विद्यालयों में नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का प्रषिक्षण’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्यार्थियों, षिक्षकों एवं अभिभावकों को संबोधित करते हुए उक्त विचार व्यक्त किये। उन्होंने विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि बालकों में ऐसा साहस होना चाहिये कि वे स्वयं के विकास का मार्ग पहचान सके, उसे खोजपूर्ण तरीकों से विकसित कर सके। उन्होंने रचनात्मकता, तेजस्विता और साहस को ज्ञानार्जन का मूल मंत्र बताया। संगोष्ठी में उपस्थित षिक्षकों से डॉ. कलाम ने आग्रह किया कि षिक्षा में सृजनषीलता एवं नैतिक मूल्यों का सम्मिश्रण हो। षिक्षक अपने ज्ञान को बालकों पर थोपे नहीं वरन बालक की रुचि एवं जिज्ञासा के अनुरूप उनका पथ प्रषस्त करें।
डॉ. कलाम ने राष्ट्रीय नैतिकता के विभिन्न आयामांेे की स्थापना हेतु परिवार एवं समाज को भी उत्तरदायी बताया क्योंकि अभिभावकों के गुण ही बालकों में परिलक्षित होते है। डॉ. कलाम ने अपने वक्तव्य के सारांष में कहा कि षिक्षा वास्तव में सत्य को आत्मसात करना है। षिक्षा, ज्ञान और अध्यात्म का अनन्त सफर है जो कि मानवता के विकास में ’माइल स्टोन’ की तरह है। सही षिक्षा ही मानवता की पहचान है जो उसके आत्मसम्मान को बढ़ाती है।
डॉ. कलाम ने इस अवसर पर ’स्कूल विद ए डिफरेन्स’ प्रायोजना के शुभारम्भ की हस्ताक्षर कर विधिवत घोषणा की। उन्होंने आषा व्यक्त की कि यह प्रायोजना षिक्षा में नैतिक मूल्यों की स्थापना का सषक्त माध्यम बन सकेगी। बालमुकुन्द सनाढ्य, प्रकाष तातेड़ एवं नरेन्द्र निर्मल ने योजना का घोषणा पत्र डॉ. कलाम को प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ डॉ. कलाम द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। अणुविभा के अध्यक्ष टी. के. जैन ने स्वागत शब्द प्रस्तुत किये। अणुविभा के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. एस.एल. गांधी ने अणुविभा की स्थापना के उद्देष्य और इतिहास को रेखांकित किया।
डॉ. कलाम 10.00 बजंे अणुव्र्रत विष्व भारती पहुंचे जहां अणुविभा पदाधिकारियों एवं कार्यकर्त्ताओं ने माल्यार्पण एवं तिलक द्वारा उनका स्वागत किया। श्री टी. के. जैन, डॉ. एस.एल. गांधी एवं संचय जैन ने डॉ. कलाम को ’चिल्ड्रन्स पीस पेलेस’ स्थित विभिन्न कक्षों व दीर्घाओं का अवलोकन कराया जहाँ विद्यार्थी बालोदय षिविर के अन्तर्गत कक्षानुरूप गतिविधियां कर रहे थे। डॉ. कलाम ने सर्वप्रथम तुलसी अणुव्रत दर्षन, महाप्रज्ञ अहिंसा दर्षन का अवलोकन किया एवं यहां प्रदर्षित प्रेरक चित्र प्रदर्षनी योगा मोड्ल्स को देखा। इसके बाद विष्व दर्षन दीर्घा, पुस्तकालय व विज्ञान कक्ष का अवलोकन किया। यहां डॉ. कलाम ने विज्ञान के विभिन्न प्रयोगों रुचिपूर्वक देखा एवं बच्चों से संवाद किया। संग्रहालय, गुड़ियाघर, महापुरूष जीवन दर्षन आदि कक्षों के द्वारा बच्चों में किस प्रकार मूल्य बोध विकसित किया जाता है, इसे डॉ. कलाम ने गहराई से समझा। बच्चों का जीवन विज्ञान कक्ष में महाप्राण ध्वनि करते हुए डॉ. कलाम कुछ क्षणों तक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। अन्त में डॉ. कलाम बाल संसद पहुंचे जहां बच्चों की मोक पार्लियामेण्ट चल रही थी। यहां कलाम बच्चें के बीच एक सीट पर बैठ गये एवं बाल संसद की पूरी कार्यवाही को देखा। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि यहां जिस शालीनता व अनुषासन के साथ संसद की कार्यवाही चलती है वैसा मैंने दिल्ली की संसद मंे नहीं देखा। बालोदय दीर्घाओं को देखकर डॉ. कलाम अभिभूत थे और उन्होंने कहा कि बच्चों के विकास के लिए एक अद्भूत केन्द्र है।
डॉ. कलाम ने अणुविभा के संस्थापक मोहनभाई को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन अणुविभा के महामंत्री संचय जैन किया। इस कार्यक्रम में अणुव्रत बालोदय के अध्यक्ष हंसमुख मेहता, कार्याध्यक्ष बालोदय सुरेष कावड़िया, मंत्री बालोदय अषोक डूंगरवाल, जिला षिक्षा अधिकारी राकेष तैलंग, जगजीवन चौरड़िया, गणेष कच्छारा आदि अनेक गणमान्य नागरिक एवं अधिकारी उपस्थित हुए। श्रीमती प्रकाषदेवी तातेड़, बाबुलाल राठोड़ एवं रमेष बोहरा ने माल्यार्पण कर स्वागत किया। गणेष कच्छारा ने स्मृति चिन्ह प्रदान किया, नरेष मेहता ने साहित्य एवं जगजीवन चौरड़िया व अषोक डूंगरवाल ने मवाड़ी पगड़ी व उपरना भेंट कर स्वागत किया।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने केलवा कस्बे में आचार्य महाश्रमण के चातुर्मास को लेकर व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी, मंत्री लवेश मादरेचा सहित सदस्यों को धन्यवाद देते हुए कहा कि गुड मैनेजमेंट ऑफ चातुर्मास। शनिवार को तेरापंथ समवसरण प्रांगण भिक्षु विहार में आयोजित अध्यात्म एवं विज्ञान विषयक चिंतन गोष्ठी में भाग लेने आए डॉ कलाम ने यह बात कही।
कोठारी परिवार के साथ बिताए 35 मिनट
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने संगोष्ठी के समापन के बाद पुनः राजसमंद की ओर जाते समय मार्ग में स्थित व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी के आवास पर करीब पैंतीस मिनट तक ठहराव किया। इस दौरान उन्होंने भोज भी ग्रहण किया और राजस्थान की प्रसिद्ध राब का स्वाद चखा। भोजनापरांत डॉ. कलाम को अध्यक्ष कोठारी, उनकी पत्नी स्नेहलता कोठारी, तेरापंथी समाज के अध्यक्ष बाबू लाल कोठारी, तेयुप के अध्यक्ष विकास कोठारी, अशोक जैन, अरविंद कावडिया सहित युवा परिषद के अनेक पदाधिकारियों ने आचार्य महाप्रज्ञ की तस्वीर भेंट की। यहां से बाहर आते वक्त बारिश से बचाने के लिए कुछ पदाधिकारियों ने छाता खोला तो वहां एक बच्चे को देखकर छाते के नीचे खडे होकर डॉ कलाम ने बच्चे को पास बुलाकर ऑटोग्राफ दिया।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भिक्षु विहार में अध्यात्म और विज्ञान पर आयोजित संगोष्ठी में कहा कि मैं आज अलौकिक वातावरण में उपस्थित हुआ हंू। आचार्य महाश्रमण एवं उनके साधु-साध्वियां अध्यात्म के शिखर को छू रहे है। आचार्य की सादगी, सरलता ने बहुत प्रभावित किया है। मेरा आचार्य महाप्रज्ञ के साथ एकत्व भाव था। आज महाश्रमण से भी
एकत्व भाव होकर आल्हादित हंू। डॉ कलाम ने कहा कि विज्ञान पदार्थ के बारे में चर्चा करता हंू और अध्यात्म क्षमता के विकास और योजना पर कार्य करता हंू। दोनों के चिन्तन की एकता, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा। मैं प्रबुद्ध संतों के बीच हंू। आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में हंू। इनमें मानवता के प्रति करुणा कूट-कूट कर भरी हुई हैं। इनके साथ अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की बात देश को नई दिशा देगी। डॉ. कलाम ने आचार्य महाप्रज्ञ का स्मरण करते हुए कहा कि उनके इस संदर्भ में अनके बार चर्चाएं हुई। उनका एक वाक्य मुझे हमेशा याद रहता है। उसमें उन्होंने कहा है कि आत्मा ही मेरा भगवान हैैं, तपस्या मेरी प्रार्थना है, मैत्री ही मेरा समर्पण है, संयम मेरी ताकत है और अहिंसा मेरा धर्म है। डा. कलाम ने कहा कि लोग युद्ध से, हिंसा से दूर रहे। यह अध्यात्म से संभव है। जब अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय होगा, तभी विश्व में शांति, समृद्धि और विकास स्थापित होगा।
महाप्रज्ञ के निर्देश पालन कर रहा हंू
मिसाइलमैन ने कहा कि जब मैं पहली बार दिल्ली में आचार्य महाप्रज्ञ से मिला था, तब उन्होंने मुझे शांति की मिसाइल बनाने की कमान सौंपी थी। इतने वर्षों में मैं इस पर शोध कर रहा हंू। आज अणु बम अमेरिका एवं रुस के पास ज्यादा है। अन्य देशों के पास 10 प्रतिशत है। आणविक ऊर्जा को निष्प्रभावी बनाने पर कार्य चल रहा हैं। पर आज अणु बम से ज्यादा खतरनाक साईबर आतंक हो रहा है। अणु बम एक साथ मनुष्यों को खत्म कर सकता है, पर यह आतंक व्यक्ति के विचारों को प्रमाणित करता है। इसके प्रभाव में आने वाले पांच व्यक्ति पचास को प्रभावित करते है इससे बचाव का उपाय खोजना जरुरी है। मैं इसको ध्यान में रखकर आचार्य महाप्रज्ञ के निर्देश पर कार्य कर रहा हंू।
मेरे तीन गुरु
मिसाइलमैन डॉ. कलाम ने कहा कि मैं तीन लोगों से प्रभावित हंू। भगवान महावीर, महात्मा गांधी और आचार्य महाप्रज्ञ। ये तीनों मेरे गुरु है। इनसे मैंने जीने की दृष्टि पाई है। इनका चिंतन मुझे राह दिखाता रहता है।
विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरकः आचार्य महाश्रमण
आचार्य महाश्रमण ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक है। विज्ञान के बिना आध्यात्म अधूरा है तो आध्यात्म के बिना विज्ञान भी पूर्ण नहीं हैं। अध्यात्म परम लक्ष्य मोक्ष है वहीं विज्ञान केवल पदार्थों तक सीमित हैं। आध्यात्म जहां अन्य शक्ति का संदेश देता है वही विज्ञान पदार्थों के प्रति आकर्षण बढा रहा है। दोनों के समन्वय होने पर ही समान विकास की राह खुल सकती है और पावरफूल राष्ट्र का निर्माण हो सकता हैं।
संगोष्ठी में अणुविभा के सोहन लाल गांधी एवं व्यवस्था समिति के महामंत्री सुरेन्द्र कोठारी ने विचार व्यक्त किए। व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी, संयुक्त मंत्री मूलचंद मेहता, स्वागताध्यक्ष परमेश्वर बोहरा, तेरापंथ सभा अध्यक्ष बाबू लाल कोठारी, मंत्री लवेश मादरेचा, महेन्द्र कोठारी अपेक्ष, प्रकाश चपलोत, राजकुमार कोठारी, राजेन्द्र कोठारी, भगवती लाल बोहरा, तेयुप अध्यक्ष विकास कोठारी, मंत्री लक्की कोठारी, महिला मंडल अध्यक्षा श्रीमती फूली देवी बोहरा, मंत्री रत्ना कोठारी, किरण कोठारी ने डॉ कलाम का परपंरागत स्वागत किया। तेजकरण सुराणा ने संचालन किया।
आचार्य महाश्रमण ने संबोधि के तीसरे अध्याय में ज्ञान को लेकर बताए गए पांच बिन्दुओं की व्याख्या करते हुए श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे ज्ञान अर्जित करते समय दूसरे की सहायता की आकांक्षा नहीं रखें। इस तरह की प्रवृति से इंन्द्रियों पर स्वयं का नियंत्रण नहीं रहता और प्रत्यक्ष की बजाय हम केवल परोक्ष ज्ञान तक ही सीमित होेकर रह जाते हैं। यह उद्गार उन्होंने शुक्रवार को भिक्षुविहार में दैनिक प्रवचन के दौरान व्यकत किए।
उन्होंने अवधिज्ञान को परिभाषित करते हुए कहा कि जो व्यक्ति समस्त कामनाओं से विरक्त हो जाता है और ध्यान-साधना की तरफ झुक जाता है। उसे इस तरह के ज्ञान की अनुभूति होती हैं। इस तरह की स्थिति आचार्य भिक्षु के जीवन के अंतिम समय में रही। उन्हें विशेष ज्ञान हुआ, जिसे आचार्य तुलसी ने अवधिज्ञान माना। इसलिए मनुष्य में ज्ञान भले ही न हो, लेकिन साधना के प्रति सदैव सचेत रहे। ज्ञान का विकास करे और विकारों को अपने आस पास नहीं आने दें। माया-मोह को मंद करे तो साधना व ज्ञान का विकास स्वतः ही हो जाएगा।
अतिकामना के परिणाम समाज के लिए घातक
उन्होंने कहा कि अतिकामना के परिणाम समाज के लिए घातक होते है। इससे पाप, अपराध और व्यसन में वृद्धि होती हैैं और ईमानदारी लुप्त हो जाती है। मन में हिंसा का प्रादुर्भाव हो जाता हैं। उन्होंने ईमानदारी के संदर्भ में चन्द्रगुप्त का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि जिस राष्ट्रª का प्रधानमंत्री ईमानदार, उज्जवल भविष्य वाला होता है तो उसकी जनता भी ईमानदारी पर विष्वास करती हैं। उन्होंने कहा कि मानव जाति मौत, कष्ट, वेदना और अवमामना से बहुत डरती है। यह हमारी दुर्बलता का परिचायक है। इस संदर्भ में मात्र सोचकर ही हम भयभीत हो जाते है। यह भय निरन्तर साधना और ध्यान करने से ही दूर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आदमी चार कारणों से झूठ बोलता है। इससे उपकृत होने का सभी को प्रयास करना चाहिए। मोहकर्म का प्रभाव हमेशा बना रहे और इसी के आधार पर साधना चलनी चाहिए। इससे ज्ञान का विकास व बुद्धि का सम्मान होगा। जिसमें ज्ञान-ध्यान का समावेश नहीं होता वह व्यक्ति इस मायने में ष्वान की श्रेणी में आ जाता हैं। उन्होंने शिविरार्थियों और विद्यार्थियों को ज्ञान अर्जित करने की सीख देते हुए आहृान किया कि वे धर्म और साधना के प्रति गंभीर रहे।
स्याह में ढंूढे जीवन का प्रकाश
मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि व्यक्ति जितनी धर्म में प्रवृति करता है वह निवृति के लिए होती है। सभी धार्मिक दर्शनों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पूरी उपासना और ज्ञानार्जन के बाद आत्मा की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है। व्यक्ति इसे तत्काल प्राप्त करने के लिए बाहरी परिप्रेक्ष्य में भटकता है, लेकिन उसे सभी ओर से असफलता मिलती है। उन्होंने कहा कि ज्ञान, ध्यान और अपेक्षानुसार तपस्या का भाव हो तो उस व्यक्ति को इसकी अनुभूति होती है। आदमी आंखे मंूदकर अनुभूति की चाह रखता है। प्रारंभ में अंधेरा दिखता है, लेकिन स्याह में उसे मार्ग को ढंूढने की जरुरत है। ज्यों-ज्यों ज्ञान मिलता जाएगा उसका जीवन प्रकाशमय हो जाएगा। उन्होंने महिला और पुरुषों को तत्व ज्ञान के विकास, जिज्ञासाएं बढाने और स्वयं का मार्ग ढंूढने का आहृान किया। गुजरात से आए वीबी चौहान ने कहा कि हमारी देह स्वस्थ है तो साधना पूरी की जा सकती हे। इसके लिए हमें मन को नियंत्रित करने की आवष्यकता हैं। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जिस व्यक्ति में धर्मयुक्त और त्याग की भावना का समावेश होता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। धर्म की बजाय भौतिकता व कुछ पाने की लालसा का भाव जिसके मन में विद्यमान हो तो उसके आस-पास देवता भी नहीं आते। आचार्य बुधवार को केलवा में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम में श्रावक-श्राविकाओं के सम्मुख दैनिक प्रवचन दे रहे थे।
आचार्य ने संबोधि के तीसरे अध्याय में उल्लेखित चार गतियों का वर्णन करते हुए कहा कि अच्छा जीव तभी जी सकता है, जब वह बाहरी गतियों को दमन करें। देवता मनुष्यों के पास भी आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए आवष्यक है कि वह धर्मयुक्त हो। जो साधक अल्प मात्रा में आहार ग्रहण करने, निद्रा पर संयम रखने और कम बोलने की क्षमता रखता हैं उसे भी देवता नमस्कार करते हैं और समय-समय पर धरती पर आते हैं। उन्होंने देवताओं के धरती पर आगमन के चार कारणों की व्याख्या करते हुए कहा कि देवता आमतौर पर मुमुक्षु आत्मा के दर्शन, तपस्वियों के दर्शन, कुटुम्बियों से मिलने और अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए साक्षात् भी दर्शन दे सकते हैं। यह प्रत्यक्ष रुप से कम वरन् अप्रत्यक्ष रुप से ज्यादा आसपास रहते हैं।
उन्होंने देवताओं के आगमन के लक्षण पर कहा कि इनका प्रतिबिम्ब कभी भी धरती पर प्रकट नहीं होता। इनके पांव हमेशा धरती से ऊंचे और अनिमेश की स्थिति बनी रहती हैं।
संबोधि में उल्लेख है कि रुखा-सूखा खाकर एकांत में निवास करने और इंद्रियों का दमन करने वाले साधक के समक्ष देवताओं का आगमन होता हैं। इन्हें लेकर मनुष्य को कभी आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, बल्कि धर्म-साधना में इतने तल्लीन हो जाना चाहिए कि देवता स्वतः ही उनके समक्ष किसी भी रुप में प्रकट हो जाए। उन्होंने देवताओं और मनुष्यों में समानता पर कहा कि दोनों के ही पांच इंद्रियां होती हैं। साथ ही कुछ असमानता भी होती है, जो नजर नहीं आती। इसे लेकर उन्होंने देवताओं के प्रकट होने का तथ्य भी प्रस्तुत किया। साथ ही कहा कि जिस साधक अथवा साधु में क्रोध और ’मैं’ की भावना आ जाती है तो वह अपनी साधना को कमजोर कर लेता हैं। इसलिए मन में कभी अपनी विशिष्टता का अहंकार नहीं लाएं। उन्होंने इस संबंध में धोबी और साधु के प्रसंग का वृतांत भी प्रस्तुत किया। साथ ही कहा कि संसार में देवताओं की अपेक्षा मनुष्यों की तादात् काफी कम हैैं। देवता समंदर है तो मनुष्य बंूद मात्र है। उन्होंने देश और प्रदेशभर के विभिन्न प्रांतों से आए श्रावक-श्राविकाओं से आहृान किया कि वे भौतिक लालसाओं के प्रति मोह त्यागकर अपने जीवन का कुछ समय धर्म और साधना को समर्पित करें। इससे न केवल उनका वरन् परिवार के अन्य सदस्यों का भी कल्याण होगा।
अच्छे कर्मों पर कायम रखें विष्वास
मंत्री मुनि सुमेरमल ने कर्मों के फल की व्याख्या करते हुए कहा कि आहृान किया कि मनुष्य को हमेशा अपने अच्छे कर्मों पर विष्वास करना होगा, ताकि कोई विकार उसके उद्देष्यों का डगमगा नहीं सके। हमें विकार को रोककर विकास की तरफ निरन्तर बढना होगा। क्यों कि जहां विकास होता है वहां विकार की संभावना ज्यादा बढ जाती है। इसके लिए जागरुक रहने की महत्ती आवष्यकता हैं। जो कर्म आसक्ति से परिपूर्ण होते है, इससे छुटकारा पाने के लिए अतिरिक्त पुरुषार्थ करना पडता है। मन को भीतर से जागरुक बनाना होगा। उन्होंने सम्यक भाव से धार्मिक कार्यों की क्रियान्विति करने का आहृान करते हुए कहा कि ऐसा करने से जीवन में सफलता मिलने की संभावना बढ जाएगी।
कार्यक्रम के दौरान कन्या मण्डल बोरज की बालिकाओं कुसुम और चंदा ने ‘ भिक्षुस्वामी संग तुम्हारा, सारे जहां से न्यारा, है यह सबको प्यारा, तुमने संवारा, तुमने निखारा गीत प्रस्तुत कर भाव विभोर कर दिया। संयोजन मुनि मोहजीत कमार ने किया।
पूर्व राष्ट्रपति और महान् वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 23 जुलाई को केलवा कस्बे में आएंगे।
चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष महेन्द्र कोठारी ने बताया कि डॉ कलाम षनिवार को कस्बे के भिक्षु विहार में आयोजित अध्यात्म एवं विज्ञान विषयक चिंतन गोष्ठी में व्याख्यान देंगे। इस दौरान अध्यात्म व विज्ञान के षिखर पुरुष अणुव्रत अनुषास्ता आचार्य महाश्रमण का विषिष्ट आतिथ्य प्राप्त होगा। कोठारी ने बताया कि दोपहर दो बजे प्रस्तावित इस गोष्ठी में केवल साधु, साध्वी एवं समणी वृन्द की सहभागिता रहेगी।